देहरादून। वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व मंत्री यशपाल आर्य ने ऋषिकेश के पशुलोक क्षेत्र और उससे जुड़ी लगभग 2866 एकड़ भूमि को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि 22 दिसंबर 2025 को माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बाद वर्षों से वन भूमि पर रह रहे हजारों परिवार भय और असमंजस की स्थिति में हैं, जिन्हें अपने घरों से बेदखली का डर सताने लगा है।
यशपाल आर्य ने पत्र में उल्लेख किया कि यह भूमि वर्ष 1952 के आसपास महात्मा गांधी की शिष्या मीरा बेन को लीज पर दी गई थी, जहां पशुलोक सेवा समिति के माध्यम से पशुपालन एवं सामाजिक गतिविधियां प्रारंभ हुई थीं। समय के साथ इस क्षेत्र में बड़ी आबादी बस गई और इसी इलाके में एम्स ऋषिकेश, आईडीपीएल जैसे प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों की स्थापना के साथ-साथ टिहरी विस्थापितों का पुनर्वास भी किया गया।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का 65 प्रतिशत से अधिक भूभाग वन भूमि है और पर्वतीय, भावर, तराई एवं मैदानी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग पीढ़ियों से वन भूमि पर निवास कर रहे हैं। बावजूद इसके, वनाधिकार कानून 2006 का राज्य में समुचित क्रियान्वयन नहीं हो सका, जिसके चलते इन लोगों को आज भी अतिक्रमणकारी या कब्जेदार की श्रेणी में रखा जा रहा है।
पत्र में यशपाल आर्य ने बिंदुखत्ता, मालधन चौड़, गौलापार, दमुवाढुंगा, पिंडर घाटी और पौड़ी जनपद के कई क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि दशकों से बसे गांवों को उजाड़ने के नोटिस जारी किए जा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इस प्रकार की एकतरफा कार्रवाई से प्रदेश में अशांति फैल सकती है और कानून-व्यवस्था की गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है।
यशपाल आर्य ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वन भूमि पर निवासरत लोगों के अधिकारों एवं समस्याओं पर व्यापक विमर्श के लिए उत्तराखंड विधानसभा का विशेष सत्र शीघ्र बुलाया जाए, ताकि इस संवेदनशील विषय पर न्यायसंगत और वैधानिक समाधान निकल सके और हजारों परिवारों को राहत मिल सके।

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