राजनीति में धनबल का असर

हो।
अगर कोई ऐसा नेता होता भी है तो आमतौर पर बड़ी पार्टियां उसको टिकट नहीं देती हैं। इसलिए ऐसे आपवादिक मामलों के लिए अलग से कानून बनाने की जरुरत नहीं समझी गई है।
परंतु समस्या सिर्फ दोषी ठहराए गए नेताओं की नहीं है, जिनकी संख्या गिनी चुनी है। समस्या आपराधिक छवि के नेताओं से है, जो अपनी ताकत के दम पर सजा पाने से बचे रहते हैं और चुनाव लड़ कर जीतते भी रहते हैं। उनको रोकने के उपायों पर विचार होना चाहिए।
असल में यह कानून से ज्यादा राजनीतिक शुचिता का मामला है। राजनीतिक दलों और आम लोगों को भी इस बारे में सोचने की जरुरत है। कानून की बजाय अगर पार्टियां यह तय करें कि वे आपराधिक छवि के लोगों को टिकट नहीं देंगी तो अपने आप यह मसला हल हो जाएगा।
आखिर पार्टियां ही दागी या आपराधिक छवि वालों को टिकट देती हैं, बड़े नेता उनके लिए प्रचार करने जाते हैं और भारत में दलीय व्यवस्था इतनी मजबूत है कि आम मतदाता भी पार्टियों से अलग बहुत कम ही मामलों में मतदान के बारे में सोचता है।
कई बार पार्टियां जातीय समीकरण साधने या मतदाताओं पर असर के लिहाज से बाहुबली किस्म के नेताओं को टिकट देती हैं। नीतीश कुमार ने एक बार बिहार में कहा था कि बाघ के सामने बकरी नहीं लड़ा सकते हैं।
यानी अगर एक पार्टी ने किसी बाहुबली या दबंग को टिकट दिया है तो बराबरी की लड़ाई सुनिश्चित करने के लिए दूसरे दलों को भी वैसे ही नेता उतारने पड़ते हैं।
यह कानून के शासन के लिए शर्म और चिंता की बात होनी चाहिए। परंतु इसे एक सामान्य व्यवहार की तरह स्वीकार कर लिया गया है। इस मामले में पार्टियां पहल करें और आम लोग भी उसमें शामिल हों।
जो राजनीति में शुचिता की जरुरत मानते हैं वे बाहुबलियों या दागी छवि वालों को चुनाव में उतारने का विरोध करें तो धीरे धीरे इससे मुक्ति मिल सकती है। कानून के जरिए इसे रोकने का उपाय मुश्किल है।

(आलेख में वैयक्तिक लेखक के निजी विचार हैं)
(मेरोउत्तराखंड.इन इनका समर्थन नहीं करता है)

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