भारतीय धार्मिक ग्रंथों में महाराजा शिवी की कहानी प्रमुख है। पुरुवंश में सामामी उशीनर देश के राजा शिवि बड़े ही परोपकारी धर्म और आत्मा थे। परम दानवीर राजा शिवजी के द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जाता था। शैतान के प्रति राजा शिवि का बड़ा स्नेह था। उनके राज्य में सदैव सुख-शांति और स्नेह का माहौल बना रहा। ईश्वर भक्त राजा शिव की चर्चा स्वर्गलोक तक थी। देवताओं के मुख से राजा शिवि की इस बात पर इंद्र और अग्नि के बारे में विश्वास नहीं हुआ था। मूलतः उन्होंने उशीनरेश की परीक्षा लेने की थानी और एक युक्ति निकाली।अग्नि ने कबूतर का रूप धारण किया और इंद्र ने एक बाज का रूप धारण किया। दोनों उड़ते-उड़ते राजा शिवि के राज्य में पहुँचे। उस समय राजा शिव एक धार्मिक यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे। कबूतर उड़ते – उड़ते अर्तानाद करते हैं राजा शिव की गोद में आ गिरा और मनुष्य की भाषा में बोला – “राजन ! मैं आपकी शरण में आया हूं , मेरी रक्षा करता है।”
थोड़ी ही देर में कबूतरों के पीछे-पीछे बाज भी आ गया और बोला – “राजन ! निसंदेह आप धर्मात्मा और परोपकारी राजा हैं। आप कृतघ्न को धन से , झूठ को सत्य से , निर्दयी को क्षमा से और क्रोध को साधुता से जीत लेते हैं , इसलिए आपका कोई शत्रु नहीं इसलिए आप अजातशत्रु नाम से प्रसिद्ध हैं। आप अपकार करने वाले का भी उपकार करते हैं , दोष आप रचनाकारों में भी गुण खोजते हैं ऐसे महान आप यह क्या कर रहे हैं ?

मैं क्षुधा से व्याकुल भोजन की तलाश में भटक रहा था। संयोग से मुझे यह पक्षी मिला और आप इसे शरण दे रहे हैं। यह आप अधर्म कर रहे हैं। कृपया करके यह कबूतर मुझे दे दो। यह मेरा भोजन है।” तीसरे में कबूतर बोला – “विद्या की प्राण रक्षा करना आपका धर्म है।” असल में आप इस बाज की बात कभी मत मानिए। यह दुष्ट बाज मुझे मार डालेगा।”
राजा शिव बाज से बोले – “हे बाज ! यह कबूतर भय से विशेष रूप से मेरा शरण आया है , मूल रूप से यह मेरा लक्ष्य है। मैं अपने शरण में जाना चाहता हूं। मैं अपने शरण में जाना चाहता हूं। जो मनुष्य भय , भय , विश्राम , लज्जा या द्वेष से शरणागत की रक्षा नहीं करता है या उसे त्याग देता है, वह लोभ ब्रह्महत्या के समान पाप कंपनी है। सभी समूह अपनी-अपनी प्राण प्रतिष्ठा रखते हैं। इनमें से सभी को अपनी शरण लेने की सलाह दी जाती है। बाज़ ! मौत के डर से ये कबूतर मैं तुम्हें नहीं दे सकता। इसके बदले में तुम खाना मांग सकते हो। मैं ये अभीष्ट वस्तु तैयार कर रहा हूं।”
तब बाज बोला – “हे राजन ! मैं कुधा से पीड़ित हूं। आप तो जानते ही हैं , भोजन से ही जीव उत्पन्न होता है और बढ़ता है। यदि मैं कुधा से ही उत्पन्न होता हूं तो मेरी संतान भी मर जाती है। आपके एक कुत्ते का बच्चा मर गया से कई स्तुति के प्राण जाने की संभावना है। हे राजन ! आप ऐसे किसी भी धर्म का पता लगा रहे हैं जो अधर्म को जन्म देने वाला है। धार्मिक मनुष्य इसी धर्म का रहस्य है जो धार्मिक धर्म का हन नहीं करता है। आप अपने ग्राहकों से बात कर सकते हैं। धर्म अभी तुम्हें हो वह मुझे बताओ।”
राजा शिवी बोले – “हे बाज ! भय से व्याकुल वेदना की रक्षा करने का कोई धर्म नहीं है। जो मनुष्य दया और करुणा से द्रुत स्वर को अभयदान देता है, वह देहकेप्रकार से छूट देता है । हो सकता है।”
हे बाज ! “तुम्हें आहार ही चाहिए सो जो चाहो सो आहार के लिए मांग लो।” बाज बोला – “हे राजन ! प्रकृति के विधान के अनुसार कबूतर ही हमारा आहार है , मूलतः आप इसे त्याग दें। “ राजा बोला – “ हे बाज ! मैं इसके विपरीत भी बताता हूं। शास्त्र सिद्धांत दया धर्म का मूल है , परोपकार पुण्य है और शास्त्रों को पीड़ा देना पाप है। अतएव तुम जो चाहो सो दे सकते हो , परन्तु ये कबूतर नहीं दे सकते।”
तब बजा बोला – “ठीक है राजन ! अगर आपका इस कबूतर के प्रति इतना ही प्यार है तो मुझे ठीक उतना ही तोलकर अपना मांस दे दीजिए , जिससे मैं अपनी खुशी शांत कर सकूं। मुझे इससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहिए।” विशेष बात यह हुई कि राजा शिव ने कहा – “हे बाज़ ! तुम चाहो , दूध मुझे तैयार करना है। यदि यह भंगुर देह धर्म के काम न आ सके तो यह व्यर्थ है।”

यह अखंड राजा ने तराजू के टुकड़ों को रखा और अपने एक झुंड में कबूतरों को स्थापित किया और उसके एक टुकड़े को अपने टुकड़ों में रखा। लेकिन कबूतर का पलड़ा कहां का तहां ही रह रहा है। तब अंत में राजा शिव स्वयं उस पलड़े में बैठ गए और बोले – “हे बाज ! ये लो मैं मित्र के सामने बैठा हूं।”
तीसरे में आकाश से पुष्प वर्षा लगी , मृदंग बजने लगे। स्वयं भगवान अपने भक्त के इस अपूर्व त्याग को देखकर प्रसन्न हो रहे थे। यह देखकर राजा शिवि विस्मय से विचार करें कि यह सब क्या कारण हो सकता है ? तृतीय मैं वह दोनों पक्षी अंतर्ध्यान हो गया और अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गया।
इंद्र ने कहा – “हे राजन ! जैसा तेरा धर्म परायण और साधक मैंने कभी नहीं देखा। मैं इंद्र जो बना था और ये अग्निदेव जो कबूतर बने थे। हम दोनों त्याग की परीक्षा लेने आए थे। राजन ! ऐसा मनुष्य विरले ही होता है जो अपने प्राणों का भी मोह न करे। ऐसा मनुष्य वह लोक जाता है , जहां से फिर लौटना नहीं है। अपना पेट पालने के लिए पशु भी छूट जाता है , वह मनुष्य है जो उसके हित में है। जीत लिया है।” इतने सारे रहस्य इंद्र और अग्नि देव स्वर्ग चले गए। राजा शिवि ने अपना यज्ञ पुरा कराया और परमपद को प्राप्त करने के बाद पृथ्वी का राज्य भोगने तक कई पवित्र स्थान प्राप्त किये।
अस्वीकरण
इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या अभिलेख की पुष्टि नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक शास्त्रों/धर्मग्रंथों से चर्चा करते हुए यह जानकारी आप तक पहुंचाई गई है। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना देना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अलावा किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं सेवक या अनुचर की ही होगी।

Recent Comments