स. संपादक शिवाकांत पाठक की कलम से
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि किसी ने क्रोध से खाना बनाया हो, तो मत खाना। क्योंकि हाथों से प्रतिपल तरंगें जा रही हैं। हाथों से विद्युत-प्रवाह जा रहा है। इसलिए तो जो तुम्हें प्रेम करता है, गहन प्रेम करता है, उसके हाथ की बनी रूखी-सूखी रोटी भी अदभुत होती है।तभी तो माँ के हाँथ का बना खाना कैसा भी हो लेकिन सभी के लिए अमृत तुल्य होता है,, क्यों कि इस संसार में माँ ही एक ऐसा पवित्र अद्भुत प्रेम का रिस्ता है जो कभी भी अपने बच्चे के लिए कुछ भी करने को समर्पित रहती है,,
होटल में कितना ही अच्छा खाना हो, कुछ कमी होती है। कुछ चूका-चूका होता है। खाना लाश जैसा होता है; उसमें आत्मा नहीं होती। लाश कितनी ही सुंदर हो, और लिपस्टिक लगा हो, और पावडर लगा हो और सब तरह की सुगंध छिड़की हो, मगर लाश आखिर लाश है। तुम्हें इस लाश में से शायद शरीर के लिए तो भोजन मिल जाएगा, लेकिन आत्मा का भोजन चूक जाएगा,,और जैसे तुम्हारे भीतर शरीर और आत्मा है, ऐसे ही भोजन के भीतर भी शरीर और आत्मा है। आत्मा प्रेम से पड़ती है। क्यों की होटल के खाने के पीछे जो भाव है वह है सिर्फ व्यापार,, धन कमाने की प्रबल इक्षा,, और जहाँ भी व्यपार है वहाँ प्रेम हो ही नहीं सकता क्यों की प्रेम ईश्वर की अद्भुत रचना है,, ईश्वर को पाने का सुगम उपाय है प्रेम जो नारी शक्ति को माँ के रूप में मिला है,, माँ के हांथो का खाना मरते समय तक आदमी भूल नहीं पाता,, हमारे देश भारत की प्राचीन संस्कृति में कभी माँ यसोदा, तो कभी कौसिल्या,, बन कर जिस अद्भुत प्रेम का उदाहरण प्रस्तुत किया आज उनकी संताने भगवान के नाम से जानी जाती हैं,, कुपुत्रो जायते क्वचिदपि कुमाता न भवति,, पुत्र कुपुत्र हो सकता है माता कुमाता नहीं हो सकती,,

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