संकटनाशन गणेश स्तोत्रम् एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है, जो भगवान गणेश को समर्पित है। इसे स्वयं महर्षि नारद ने रचा था, जब वे एक बार घोर संकट में फँस गए थे। जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे आयु, कामना और अर्थ की सिद्धि प्राप्त होती है।
संकटनाशन गणेश स्तोत्र भगवान गणेश के 12 विशिष्ट नामों का स्मरण करता है, जिनमें उनके विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन है। नारद पुराण में इसका वर्णन मिलता है. इसका नारद जी ने भगवान शिव के निर्देश पर पाठ किया था, जिससे उनके सभी संकट दूर हो गए।
संकटनाशन गणेश स्तोत्र को तीनों संध्याओं में पढ़ने की सलाह दी जाती है। इसका नियमित पाठ करने से विघ्न, कष्ट, और संकट दूर होते हैं। जो भी श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन की मुश्किलें खुद-ब-खुद दूर होने लगती हैं। स्तोत्र में ही लिखा गया है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से इस गणपति स्तोत्र का जप करता है, मात्र छः महीने में उसे निश्चित फल मिलने लगता है और एक वर्ष के भीतर वह अपनी मनोकामनाओं की सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

संकटनाशन गणेश स्तोत्रम् में गणेश जी के बारह नामों का क्रमशः वर्णन किया गया है – वक्रतुण्ड, एकदंत, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचंद्र, विनायक, गणपति, गजानन। जो व्यक्ति इन बारह नामों का तीनों संध्याओं में पाठ करता है, उसे किसी विघ्न का भय नहीं रहता और वह सभी सिद्धियाँ प्राप्त करता है। इसका पाठ करने से विद्यार्थी को विद्या, धन चाहने वाले को धन, संतान चाहने वाले को संतान और मोक्ष चाहने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से गणेश चतुर्थी, बुधवार और संकट चतुर्थी को पढ़ना अत्यंत फलदायी माना गया है।
संकटनाशन गणेश स्तोत्र के लाभ
जीवन के संकटों का नाश
विद्या, धन, पुत्र और मोक्ष की प्राप्ति
मन की शांति और आत्मबल में वृद्धि
ग्रह दोषों और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा
सिद्धियों की प्राप्ति
आर्थिक स्थिरता की प्राप्ति
संकटनाशन गणेश स्तोत्रम् हिन्दी अर्थ सहित
श्रीगणेशाय नमः ॥
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यायुष्कामार्थसिद्धये ॥ 1 ॥
सिर झुकाकर गौरीपुत्र विनायक (गणेशजी) को प्रणाम करूँ, जो भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। उन्हें स्मरण करने से दीर्घायु, धन और इच्छित सिद्धि प्राप्त होती है।
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ 2 ॥

गणेशजी के बारह नामों में – पहला है वक्रतुंड (टेढ़ी सूंड वाले), दूसरा एकदंत (एक ही दाँत वाले), तीसरा कृष्ण पिंगाक्ष (श्यामवर्ण और ताम्रवर्ण आँखों वाले) और चौथा गजवक्त्र (हाथी-मुख वाले)।
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ 3 ॥
पाँचवाँ नाम है लम्बोदर (बड़ा उदर वाले), छठा विकट (अत्यंत विशाल और प्रबल रूप वाले), सातवाँ विघ्नराज (सभी विघ्नों के अधिपति) और आठवाँ धूम्रवर्ण (धुएँ के समान वर्ण वाले)।
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ 4 ॥
नवाँ नाम है भालचन्द्र (माथे पर चन्द्र धारण करने वाले), दसवाँ विनायक (सर्वश्रेष्ठ नेता), ग्यारहवाँ गणपति (गणों के स्वामी) और बारहवाँ गजानन (हाथी के समान मुख वाले)।
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम् ॥ 5॥
जो मनुष्य इन बारह नामों का स्मरण दिन में तीन बार (प्रातः, मध्यान्ह, सायं) करता है, उसे कभी विघ्नों का भय नहीं होता और उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ 6॥
विद्या चाहने वाले को विद्या, धन की इच्छा रखने वाले को धन, संतान चाहने वाले को संतान और मोक्ष चाहने वाले को मुक्ति मिलती है।
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षडभिर्मासे फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिध्दीं च लभते नात्र संशय:॥ 7 ॥

जो व्यक्ति नियमित रूप से इस गणपति स्तोत्र का जप करता है, मात्र छः महीने में उसे निश्चित फल मिलने लगता है और एक वर्ष के भीतर वह अपनी मनोकामनाओं की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इसमें किसी प्रकार का संशय (संदेह) नहीं है।
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ॥ 8॥
जो साधक इस स्तोत्र को लिखकर आठ ब्राह्मणों को श्रद्धा से भेंट करता है, उसे भगवान गणेश की कृपा से सभी प्रकार की विद्याएँ और ज्ञान सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।
॥ इति श्रीनारदपुराणे संकटनाशनं गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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