पटना। बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों को लेकर कांग्रेस ने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। पार्टी की राष्ट्रीय पैनलिस्ट गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि इन नतीजों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गहरी चिंताएँ पैदा कर दी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी माहौल समान अवसर और निष्पक्षता के मानकों पर खरा नहीं उतरा।
दसौनी ने उदाहरण देते हुए कहा कि चुनाव के बीच सीधे लाभ हस्तांतरण आचार संहिता की भावना के विरुद्ध है। प्रधानमंत्री द्वारा चुनाव के दौरान एक करोड़ से अधिक महिलाओं को ₹10,000 का हस्तांतरण ऐसा कदम था, जो मतदाताओं को प्रभावित करने वाला माना जा सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि विपक्ष-शासित राज्यों में योजनाएँ रोकने वाला चुनाव आयोग, बिहार में ऐसे निर्णय पर मौन क्यों रहा।
कांग्रेस ने वोटर लिस्ट में डिलीशन और जोड़ में अनियमितताओं को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। दसौनी ने कहा कि कई क्षेत्रों से वोटर डिलीशन, लक्षित तरीके से फर्जी नाम जोड़ने और ‘फ्लोटिंग वोटरों’ के उपयोग के आरोप सामने आए हैं। यह पैटर्न महाराष्ट्र, हरियाणा और 2024 लोकसभा चुनाव में देखे गए घटनाक्रम से मिलता-जुलता है। उन्होंने कहा कि इन आरोपों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होनी चाहिए।
कांग्रेस का मानना है कि यह परिणाम गठबंधन के खिलाफ जनादेश नहीं, बल्कि व्यवस्थित अनियमितताओं का संकेत हैं। महागठबंधन और कांग्रेस दोनों का कहना है कि बिहार की जनता ने परिवर्तन की इच्छा दिखाई थी, लेकिन परिणामों में कई विसंगतियाँ हैं जो वास्तविक जनादेश से मेल नहीं खातीं।
दसौनी ने कहा कि बिहार के युवा बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा और अवसरों की कमी से लगातार जूझ रहे हैं। इन मुद्दों को चुनाव के केंद्र में होना चाहिए था, लेकिन वोट डिलीशन और अनियमितताओं की वजह से इनकी वास्तविक अभिव्यक्ति बाधित हुई।
कांग्रेस ने मांग की है कि वोटर सूची संबंधी अनियमितताओं, मतदान प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, लाभ वितरण के समय और प्रकृति, तथा CCTV रिकॉर्डिंग की उपलब्धता पर उच्चस्तरीय, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराई जाए।
दसौनी ने कहा कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि निर्वाचन प्रक्रिया पर जनता का विश्वास पुनः स्थापित हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग की भूमिका और चुनावी प्रक्रियागत कमियों की गहन समीक्षा अब समय की मांग है।

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