देहरादून । उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का नाम बदलने के प्रस्ताव को गरीबों के रोजगार अधिकार और गांधी विचारों पर सीधा हमला करार दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार सिर्फ योजनाओं के नाम बदलने की राजनीति कर रही है, जबकि नए रोजगार सृजन या गरीबों के लिए समान प्रभाव वाली दूसरी योजनाएं लाने में पूरी तरह विफल रही है।
गणेश गोदियाल ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस मनरेगा के नए नाम का विरोध कर रही है। गोदियाल ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस की आपत्ति किसी धार्मिक नाम पर नहीं, बल्कि उस “खतरनाक खेल” पर है जिसमें गरीबों के लिए बनी कानूनी गारंटी वाली योजना को नया धार्मिक-राजनीतिक जामा पहनाकर उसकी मूल आत्मा कमजोर की जा रही है। उनके अनुसार, भाजपा सरकार पिछली सरकारों की योजनाओं का केवल नाम बदलकर अपनी 12 साल की उपलब्धियों का झूठा बखान कर रही है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि मनरेगा कानून देश के करोड़ों ग्रामीणों के लिए काम का कानूनी अधिकार है, लेकिन केंद्र सरकार इसे कमजोर कर रोजगार के अधिकार कानून को खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जिस योजना को भाजपा नेता “कांग्रेस की विफलताओं का स्मारक” बता रहे हैं, उसी योजना का नाम बदलकर “जी राम जी” या अन्य नामों से श्रेय लेने की कोशिश की जा रही है, जो राजनीतिक ईमानदारी के मूल मानकों के विपरीत है।
गणेश गोदियाल ने कहा कि मनरेगा कानून “हर हाथ को काम दो, काम का पूरा दाम दो” के सिद्धांत पर बना था और इसने ग्रामीण भारतीयों को काम मांगने तथा वर्ष में 100 दिन के रोजगार का कानूनी अधिकार दिया था। उनके अनुसार, रोजगार कानून से महात्मा गांधी का नाम हटाकर नई योजना लाना गांधीजी की श्रम की गरिमा, सामाजिक न्याय और सबसे गरीब व्यक्ति के प्रति राज्य की नैतिक जिम्मेदारी के प्रतीकात्मक संदेश को मिटाने की संगठित कोशिश है, जो भाजपा-आरएसएस की गांधी विरोधी मानसिकता को उजागर करती है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस सरकार के समय केंद्र मनरेगा के तहत मजदूरी व्यय की प्रमुख वित्तीय जिम्मेदारी उठाता था, जिससे यह वास्तविक राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के रूप में काम कर पाती थी। लेकिन भाजपा सरकार का नया ढांचा इस कानूनी हक को केंद्र-नियंत्रित अनुदान आधारित योजना में बदल देता है, जिसमें न तो रोजगार की पक्की गारंटी है और न ही यह भरोसा कि जरूरत के समय काम उपलब्ध होगा; साथ ही वित्तीय बोझ राज्यों पर डालकर संघवाद और राज्यों की आर्थिक स्वायत्तता को भी कमजोर किया जा रहा है।

Recent Comments