लोग पूजा शान्ति से आराम से बैठकर करते हैं लेकिन कई बार पूजा घर में जगह कम होने या किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने के कारण कुछ लोग खड़े होकर पूजा करते हैं। लेकिन क्या खड़े होकर पूजा करना शास्त्रसम्मत है? आखिर बैठकर पूजा क्यों की जाती है?
वैसे तो पूजा का मूल भाव श्रद्धा और ध्यान है, लेकिन पूजा को लेकर कई नियम हैं, ताकि आपको रीति-रिवाजों का पूरा लाभ मिल सके। जब कोई पूजा करता है, तो शास्त्रों में बैठकर पूजा करने के सलाह दी जाती है। शास्त्रों में पूजा के लिए आसन, जैसे कुश के बने आसन या चटाई का उल्लेख मिलता है। खाली जमीन पर बैठकर पूजा करने से मना किया जाता है। नियम यह भी है कि पूजा करने वाले का आसन भगवान् के आसन से नीचे होना चाहिए। लेकिन पूजा करने के आसन को जरूरी क्यों बताया गया है, चलिए जानते हैं…
पूजा आसन पर बैठकर क्यों करना चाहिए?
जब हम पूजा करते हैं, तो उस समय हमारे शरीर और आसपास की ऊर्जा बहुत अलग होती है। ऊर्जा अपने सर्वोच्च और शुद्ध रूप में होती है। बैठकर पूजा करना आपको न केवल एकाग्रता, सुविधा और स्थिरता देता है, बल्कि यह आपको पृथ्वी तत्त्व से जोड़े रखता है। बैठने से मन जल्दी शांत होता है। ध्यान या जप बैठकर करना अधिक स्थिरता देता है। आसन पर बैठकर पूजा करने इसलिए कहा जाता है, ताकि आपके शरीर की ऊर्जा पृथ्वी में ना चली जाए। आसन के जरिये आप पृथ्वी तत्व से जुड़े तो रहते हैं लेकिन आपकी ऊर्जा की ग्राऊंडिंग नहीं होती। आसन आपको एक सुविधाजनक स्थिति भी देता है। लेकिन कोशिश ये करनी चाहिए की आपका आसन प्राकृतिक रूप से शुद्ध चीजों से बना हो। तभी कुश के आसन पर बैठकर पूजा करने पर जोड़ दिया जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि पूजा के दौरान मन का भाव जरूरी होता है। इसलिए, खड़े होकर पूजा करना गलत नहीं माना गया है और ना ही शास्त्र के नजरिये से इसे गलत समझा गया है। पूजा का उद्देश्य मन को केंद्रित करना है और वह किसी भी आसन में संभव है। यदि आप खड़े होकर भी आँखें बंद करके ध्यान करें, तो वही प्रभाव मिल सकता है। किसी भी तरह का आसन या पोजीशन उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना मन की एकाग्रता। वैसे भी पूजा में आरती खड़े होकर ही गाई जाती है। यदि जगह कम हो या बैठने की व्यवस्था न हो, तो खड़े होकर भी मंत्रजप, आरती, दीपदान, जल अर्पण आदि किए जा सकते हैं। देवता को भाव से अर्पण करना ही मुख्य है, शरीर की स्थिति गौण है। अगर लंबा समय खड़े रहना कठिन हो, तो केवल मुख्य क्रियाएँ ही खड़े होकर करें। बस खड़े होकर पूजा करते समय ध्यान रखें कि शरीर स्थिर रहे, मन एकाग्र रहे और जल्दबाजी ना हो।
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