देहरादून। चार धाम यात्रा 2025 को लेकर एसडीसी फाउंडेशन की ताजा रिपोर्ट ने यात्रा प्रबंधन, श्रद्धालु सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और बुनियादी ढांचे से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि केवल रिकॉर्ड संख्या में तीर्थयात्रियों के पहुंचने को उपलब्धि मान लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यात्रा को सुरक्षित, संतुलित, टिकाऊ और व्यवस्थित बनाना अब सबसे बड़ी जरूरत है। अध्ययन में यात्रा के दौरान फुटफॉल के उतार-चढ़ाव, कई दिनों तक बेहद कम आवाजाही और कुछ दिनों में पूरी तरह ठप स्थिति को भी विस्तार से रेखांकित किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, यात्रा अवधि में कुल 86 दिन ऐसे दर्ज हुए जब चारों धामों में से किसी भी धाम में एक भी श्रद्धालु नहीं पहुंचा। इसके अलावा 67 दिन ऐसे रहे जब श्रद्धालुओं की संख्या 1 से 500 के बीच सीमित रही, जबकि 80 दिनों में यह आंकड़ा 501 से 1000 के बीच रहा। सबसे अधिक चिंता की बात यह रही कि यमुनोत्री में 38 दिन और गंगोत्री में 35 दिन ऐसे रहे, जब वहां श्रद्धालुओं की आवाजाही शून्य रही। इससे यह संकेत मिलता है कि यात्रा केवल भीड़ के दबाव की समस्या से नहीं, बल्कि असंतुलित संचालन और मौसम आधारित अनिश्चितताओं से भी जूझ रही है।
रिपोर्ट में चार धाम यात्रा से जुड़ी कई केंद्रीय चुनौतियों को स्पष्ट तौर पर चिन्हित किया गया है। इनमें पीक सीजन के दौरान बेकाबू भीड़, कमजोर और दबाव झेलने में अक्षम बुनियादी ढांचा, पर्यावरण पर बढ़ता असर, और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते सुरक्षा जोखिम प्रमुख रूप से शामिल हैं। अध्ययन में कहा गया है कि यात्रा के चरम समय में श्रद्धालुओं का दबाव इतना बढ़ जाता है कि व्यवस्थाएं लड़खड़ाने लगती हैं, जबकि दूसरी ओर खराब मौसम और मार्ग अवरोध के समय यात्रा लगभग ठहर जाती है। इस असंतुलन का असर न केवल यात्रियों की सुविधा पर पड़ता है, बल्कि स्थानीय व्यवस्था और संसाधनों पर भी भारी दबाव बनाता है।
हेलीकॉप्टर सेवाओं को लेकर भी रिपोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। बताया गया है कि करीब छह सप्ताह के भीतर पांच हेलीकॉप्टर घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से दो हादसे जानलेवा साबित हुए, जिनमें कुल 13 लोगों की मौत हुई। खास तौर पर गौरीकुंड के पास हुई दुर्घटना ने हवाई सुरक्षा मानकों, संचालन व्यवस्था और निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। रिपोर्ट का संकेत है कि पर्वतीय क्षेत्रों में संचालित ऐसी सेवाओं के लिए सामान्य प्रोटोकॉल पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि अधिक सख्त, विशेष और परिस्थितिनुकूल सुरक्षा मानक लागू किए जाने चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि खराब मौसम, भूस्खलन, मार्ग बाधित होने और अव्यवस्थित ढांचे के कारण कई दिनों तक यात्रा प्रभावित रही। नतीजतन, कई स्थानों पर या तो श्रद्धालुओं की संख्या बहुत कम रही या फिर यात्रा पूरी तरह थम गई। इसका सीधा असर स्थानीय व्यापार, होटल व्यवसाय, परिवहन सेवाओं, घोड़ा-खच्चर संचालकों, दुकानदारों और यात्रा पर निर्भर हजारों परिवारों की आय पर पड़ा। यानी यात्रा प्रबंधन की खामियां केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं।
एसडीसी फाउंडेशन ने अपनी रिपोर्ट में स्थिति सुधारने के लिए 10 महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं। इनमें सबसे पहले रिकॉर्ड संख्या की दौड़ से हटकर सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही गई है। साथ ही वहन क्षमता के आधार पर यात्रा संचालन, मजबूत और त्वरित आपदा प्रबंधन तंत्र, हेलीकॉप्टर सेवाओं के लिए कड़े सुरक्षा मानक, स्वास्थ्य और मेडिकल तैयारियों को सुदृढ़ करना, पर्यावरण संरक्षण तथा अपशिष्ट प्रबंधन पर प्रभावी काम, और डेटा आधारित तथा तकनीक-सक्षम यात्रा प्रणाली विकसित करने पर बल दिया गया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि यात्रा को दीर्घकालिक रूप से सफल बनाना है, तो प्रबंधन को अनुमान या दबाव के बजाय वैज्ञानिक आंकड़ों और वास्तविक क्षमता के आधार पर चलाना होगा।
रिपोर्ट में हेलीकॉप्टर पायलट कैप्टन डी.के. यादव और पूर्व बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति सदस्य भास्कर डिमरी के विचार भी शामिल किए गए हैं। दोनों विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया है कि पर्वतीय यात्रा को सुरक्षित बनाने के लिए केवल उत्साह पर्याप्त नहीं, बल्कि बेहतर समन्वय, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और आधारभूत ढांचे में ठोस सुधार जरूरी हैं। उनका मानना है कि यात्रा प्रबंधन को स्थानीय भूगोल, मौसमीय जोखिम और वास्तविक वहन क्षमता के अनुरूप ढालना होगा।
एसडीसी फाउंडेशन के अनूप नौटियाल ने कहा कि सरकार को अब केवल रिकॉर्ड संख्या के प्रचार से आगे बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, समय की मांग यह है कि चार धाम यात्रा को सुरक्षित, सतत, संतुलित और डेटा-आधारित मॉडल पर संचालित किया जाए। उन्होंने बताया कि यह रिपोर्ट जल्द ही पर्यटन मंत्री, मुख्य सचिव और अन्य संबंधित अधिकारियों को सौंपी जाएगी, ताकि भविष्य की यात्रा व्यवस्था को अधिक जिम्मेदार और प्रभावी बनाया जा सके।

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