डॉ. गीता खन्ना की बड़ी पहल: नैनीताल सम्मेलन में बाल अधिकारों के लिए तैयार होगी देश की पहली व्यवहारिक ‘हैंडबुक’

बाल संरक्षण तंत्र, साइबर सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, मानव तस्करी, नशा मुक्ति और बाल-अनुकूल न्याय प्रणाली पर विशेषज्ञों ने किया मंथन

नैनीताल। उत्तराखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (यूकेएससीपीसीआर) ने बाल अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी पहल करते हुए 23 एवं 24 मार्च, 2026 को डॉ. आर.एस. टोलिया उत्तराखंड प्रशासन अकादमी, नैनीताल में “बाल अधिकारों पर हैंडबुक निर्माण (एक बच्चों के लिए एवं एक हितधारकों के लिए)” विषय पर दो दिवसीय गोलमेज सम्मेलन का सफल आयोजन किया। आयोग की अध्यक्षा डॉ. गीता खन्ना के नेतृत्व में आयोजित यह पहल अपने आप में राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रथम और भगीरथ प्रयास मानी जा रही है, क्योंकि बाल अधिकारों से जुड़े विषयों पर बच्चों और विभिन्न हितधारकों के लिए अलग-अलग, व्यवहारिक और उपयोगी हैंडबुक तैयार करने की दिशा में इस तरह का प्रयास पहली बार सुनियोजित रूप से किया गया।

सम्मेलन का मूल उद्देश्य दो ऐसी प्रभावी हैंडबुक तैयार करना है, जो एक ओर बच्चों को उनके अधिकारों, सुरक्षा उपायों और उपलब्ध संस्थागत तंत्र की जानकारी सरल, सहज और बाल-अनुकूल भाषा में दें, वहीं दूसरी ओर पुलिस, प्रशासन, शिक्षा, न्याय, परिवहन, श्रम, मानसिक स्वास्थ्य, बाल संरक्षण तथा अन्य संबद्ध विभागों जैसे हितधारकों को एक व्यवहारिक मार्गदर्शिका उपलब्ध कराएं। इस पहल का लक्ष्य बाल संरक्षण प्रणाली को अधिक प्रभावी, अधिक उत्तरदायी और बेहतर समन्वित बनाना है, ताकि बाल अधिकार केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित न रह जाएं, बल्कि जमीनी स्तर पर उनके संरक्षण की व्यवस्था और मजबूत हो सके।

सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए आयोग की अध्यक्षा डॉ. गीता खन्ना ने आयोजन के उद्देश्य, उसकी रूपरेखा और अपेक्षित परिणामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बच्चों और उनसे जुड़े हितधारकों को उनके अधिकारों, कर्तव्यों, सुरक्षा प्रावधानों तथा संबंधित नियमों की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराना समय की बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इन दोनों हैंडबुक के निर्माण का कार्य शीघ्रातिशीघ्र पूरा किया जाए, ताकि इनका लाभ सीधे बच्चों, अभिभावकों, शिक्षकों, संस्थानों तथा विभिन्न विभागों को मिल सके। डॉ. खन्ना ने यह भी रेखांकित किया कि राष्ट्रीय स्तर पर यह अपने आप में एक अभिनव और पहला प्रयास है, जो भविष्य में अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है।

सम्मेलन में विभिन्न राज्यों और राष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञों की उल्लेखनीय और गरिमामयी सहभागिता रही। विभिन्न आयोगों के अध्यक्षों में डॉ. श्यामल प्रसाद सैकिया, अध्यक्ष, असम राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग; श्रीमती जयन्ती देबबर्मा, अध्यक्षा, त्रिपुरा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग; तथा मुकेश कुमार, अध्यक्ष, अनुसूचित जाति आयोग, विशेष रूप से शामिल रहे। इन सभी ने बाल अधिकार संरक्षण की चुनौतियों, राज्यों के अनुभवों और संस्थागत समन्वय की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।

सम्मेलन में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की ओर से भी सक्रिय सहयोग और सहभागिता देखने को मिली। संजीव शर्मा, सदस्य सचिव, NCPCR, ने आभासी माध्यम से सम्मेलन में भाग लेते हुए इस महत्वपूर्ण पहल की सराहना की और हैंडबुक तैयार करने के लिए पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की पहल के बारे में सोचना ही अपने आप में बड़ी बात है। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस विषय पर आगामी माह दिल्ली में एक और महत्वपूर्ण चर्चा आयोजित की जाएगी, जिससे इस प्रयास को राष्ट्रीय विमर्श से भी जोड़ा जा सके।

इस कार्यशाला के सफल आयोजन में आयोग के प्रशासनिक तंत्र की भी सक्रिय भूमिका रही। आयोजन में सचिव एस.के. बरनवाल, अनु सचिव एस.के. सिंह तथा अन्य संबंधित अधिकारियों और सहयोगियों ने महत्वपूर्ण सहभागिता निभाई, जिससे सम्मेलन को सुव्यवस्थित, सारगर्भित और परिणामोन्मुख बनाया जा सका।

वरिष्ठ अधिकारियों की श्रेणी में भी सम्मेलन को व्यापक संस्थागत समर्थन प्राप्त हुआ। के.पी.आई. इलियास, बीपीआरएंडडी, तथा श्रीमती संगमित्रा बारिक, संयुक्त निदेशक, NIPCCD, ने आभासी माध्यम से सम्मेलन में सहभागिता कर महत्वपूर्ण सुझाव दिए। वहीं श्रीमती भावना सक्सेना, मुख्य कार्यपालक अधिकारी एवं सदस्य सचिव, केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA); कार्तिकेय जोशी, सहायक निदेशक, उजाला; डॉ. पंकज, राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण; उमेश चंद राय, उप श्रम आयुक्त, श्रम विभाग; अरविंद कुमार पाण्डेय, क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (RTO); जगदीश चंद्र, पुलिस अधीक्षक (सिटी), नैनीताल; तथा मनोज बिष्ट, निरीक्षक, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने भी अपनी उपस्थिति और विचारों से सम्मेलन को समृद्ध किया।

तकनीकी और विशेषज्ञ वर्ग की भागीदारी ने सम्मेलन को और अधिक उपयोगी बनाया। श्री सब्बीर, साइबर थ्रेट एनालिस्ट, तथा केशव, I4C, ने बाल सुरक्षा के डिजिटल पक्ष, साइबर खतरों और ऑनलाइन अपराधों से बच्चों की रक्षा जैसे अत्यंत समकालीन विषयों पर दृष्टि प्रस्तुत की। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग से जुड़े विशेषज्ञों ने भी विशेष योगदान दिया, जिनमें विशेष रूप से श्री परेश शाह ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता कर अपने विचार साझा किए। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि प्रस्तावित हैंडबुक केवल सैद्धांतिक दस्तावेज न हों, बल्कि वर्तमान चुनौतियों के अनुरूप एक व्यावहारिक मार्गदर्शक के रूप में विकसित हों।

उत्तराखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की ओर से भी कई अधिकारियों ने सम्मेलन में सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. एस.के. सिंह, अवर सचिव; सुश्री ममता रौथाण, विधि अधिकारी; एवं डॉ. निशात इकबाल, बाल मनोवैज्ञानिक, ने अपने-अपने विशेषज्ञता क्षेत्रों के आधार पर चर्चा को दिशा दी। इनकी भूमिका विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण रही क्योंकि प्रस्तावित हैंडबुक को कानूनी, मनोवैज्ञानिक, प्रशासनिक और बाल-अनुकूल दृष्टि से संतुलित और समावेशी बनाना सम्मेलन का एक प्रमुख उद्देश्य था।

दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान आयोजित विभिन्न तकनीकी सत्रों में बाल अधिकारों और बाल संरक्षण से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर और बहुआयामी विचार-विमर्श हुआ। इनमें बाल संरक्षण तंत्र, बाल-अनुकूल न्याय प्रणाली, साइबर सुरक्षा, मानव तस्करी, नशा मुक्ति, मानसिक स्वास्थ्य, विद्यालयों में बाल अधिकार, तथा सार्वजनिक स्थानों एवं परिवहन में बाल सुरक्षा जैसे विषय विशेष रूप से शामिल रहे। इन विषयों पर चर्चा का उद्देश्य यह था कि हैंडबुक में केवल सिद्धांत या कानूनी जानकारी ही न हो, बल्कि बच्चों और हितधारकों के सामने आने वाली वास्तविक चुनौतियों का समाधान भी उपलब्ध कराया जा सके।

डॉ. गीता खन्ना की अध्यक्षता में आयोजित समूह चर्चाओं ने सम्मेलन को एक परिणामपरक दिशा दी। इन चर्चाओं के माध्यम से बच्चों के लिए प्रस्तावित हैंडबुक और हितधारकों के लिए तैयार की जाने वाली दूसरी हैंडबुक की संरचना, प्रमुख अध्याय, विषयवस्तु, प्रस्तुतीकरण शैली और व्यवहारिक उपयोगिता पर ठोस सुझाव सामने आए। विशेष ध्यान इस बात पर दिया गया कि बच्चों के लिए तैयार की जाने वाली सामग्री सरल, समझने योग्य, विश्वास पैदा करने वाली और प्रेरक हो, जबकि हितधारकों के लिए तैयार दस्तावेज उत्तरदायित्व, प्रक्रिया, हस्तक्षेप, समन्वय और संवेदनशीलता के पहलुओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करे।

सम्मेलन के दौरान यह सुनिश्चित करने पर बल दिया गया कि तैयार की जाने वाली दोनों हैंडबुक व्यवहारिक, समावेशी और बाल-अनुकूल हों। इसके पीछे सोच यह रही कि बाल अधिकारों का प्रभावी संरक्षण तभी संभव है जब बच्चे स्वयं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों और उनसे जुड़े सभी हितधारक अपनी भूमिका, जिम्मेदारियों और प्रक्रियाओं के प्रति स्पष्ट हों। यही कारण रहा कि सम्मेलन में विधिक, मनोवैज्ञानिक, प्रशासनिक, सुरक्षा, परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े आयामों को समान महत्व दिया गया।

समापन सत्र में सम्मेलन के प्रमुख निष्कर्षों और सिफारिशों को साझा किया गया। प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति जताई कि बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए केवल कानून होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन कानूनों, संस्थागत प्रणालियों और सहयोगी तंत्र की जानकारी को सरल और उपयोगी रूप में समाज तक पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है। सम्मेलन के अंत में सभी विशेषज्ञों, अधिकारियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया तथा यह विश्वास व्यक्त किया गया कि यह पहल आने वाले समय में बाल अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगी।

स्पष्ट है कि उत्तराखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा किया गया यह प्रयास केवल एक औपचारिक सम्मेलन नहीं, बल्कि बच्चों के सुरक्षित, जागरूक और अधिकार-सम्मत भविष्य की दिशा में एक ठोस बुनियादी पहल है। यदि इस सम्मेलन में सुझाए गए बिंदुओं के अनुरूप दोनों हैंडबुक तैयार होकर प्रभावी रूप से लागू होती हैं, तो यह न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश में बाल अधिकारों को व्यवहारिक धरातल पर मजबूत करने की दिशा में एक अनुकरणीय मॉडल बन सकती है।

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