नई दिल्ली/देहरादून। अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय की मांग को लेकर देश की राजधानी दिल्ली में होने वाला ‘गांधीवादी सत्याग्रह’ पुलिसिया कार्रवाई की भेंट चढ़ गया। अंकिता के हक में आवाज उठाने जंतर-मंतर जा रहे उत्तराखंड कांग्रेस के उपाध्यक्ष धीरेंद्र प्रताप और अन्य आंदोलनकारियों को दिल्ली पुलिस ने रास्ते में ही हिरासत में ले लिया। इस दौरान नेताओं ने केंद्र सरकार पर लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन और तानाशाही का गंभीर आरोप लगाया
पुलिस ने छीने मोबाइल, वकील से भी नहीं मिलने दिया
हिरासत से रिहा होने के बाद प्रेस क्लब में पत्रकारों से मुखातिब होते हुए धीरेंद्र प्रताप ने पुलिस की कार्रवाई पर गहरा रोष व्यक्त किया। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें संसद मार्ग थाने में 4 घंटे से अधिक समय तक बलपूर्वक बिठाए रखा गया। उनके दोनों मोबाइल फोन छीन लिए गए ताकि वे किसी से संपर्क न कर सकें। हैरानी की बात यह रही कि उन्हें उनके कानूनी सलाहकार (वकील) तक से बात करने की इजाजत नहीं दी गई।
“मोदी सरकार में प्रजातांत्रिक अधिकारों की हत्या”
धीरेंद्र प्रताप ने तीखा हमला बोलते हुए कहा, *“मोदी सरकार में नागरिकों के प्रजातांत्रिक अधिकारों की हत्या कर दी गई है। आज देश में शांतिपूर्ण और गांधीवादी सत्याग्रह करने तक की आजादी नहीं बची है।”* उन्होंने साफ किया कि अंकिता भंडारी का मुद्दा उत्तराखंड की ‘आन-बान और शान’ से जुड़ा है और जब तक दोषियों को सजा व ‘वीआईपी’ चेहरे को बेनकाब नहीं किया जाता, आंदोलन थमेगा नहीं।

संयुक्त नेतृत्व में उठाई गई थी आवाज
बता दें कि इस सत्याग्रह का आह्वान अंकिता हत्याकांड में सीबीआई की ‘लचर पैरवी’ के खिलाफ किया गया था। इस आंदोलन का नेतृत्व संयुक्त रूप से निम्नलिखित प्रमुख हस्तियां कर रही थीं:
कमला पंत (अध्यक्ष, महिला मंच)
धीरेंद्र प्रताप (उपाध्यक्ष, उत्तराखंड कांग्रेस)
उमाकांत लाखेड़ा(पूर्व अध्यक्ष, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया)
हरिपाल रावत(पूर्व सचिव, कांग्रेस)
देव सिंह रावत (अध्यक्ष, आंदोलनकारी समन्वय समिति) सहित मनीष केडियाल, दाता राम चमोली और मनमोहन सिंह।
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को ज्ञापन देने की थी तैयारी
आंदोलनकारियों की मुख्य मांग है कि हत्याकांड में संलिप्त तमाम रसूखदारों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए और उस ‘वीआईपी’का नाम सार्वजनिक कर उसे जेल भेजा जाए, जिसका जिक्र बार-बार इस मामले में आता रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को ज्ञापन सौंपकर उत्तराखंड की बेटी के लिए न्याय की गुहार लगाना चाहते थे, लेकिन पुलिसिया कार्रवाई ने उनके लोकतांत्रिक विरोध को रोकने का प्रयास किया।


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