
देहरादून/पौड़ी। उत्तराखंड के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में शुमार एम्स ऋषिकेश एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार मामला एक गंभीर रूप से झुलसे सरकारी कर्मी की मौत से जुड़ा है, जिसके बाद रेफरल व्यवस्था, मरीजों की भर्ती प्रक्रिया और अस्पतालों के बीच समन्वय को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार कोट विकासखंड में तैनात कर्मचारी भरत भंडारी अपने सरकारी आवास में आग से झुलस गए थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए जिला अस्पताल से उन्हें उच्च उपचार के लिए एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया। परिजनों का आरोप है कि एम्स पहुंचने पर मरीज को भर्ती नहीं किया गया और बेड उपलब्ध न होने की बात कही गई। उनका कहना है कि आवश्यक चिकित्सकीय सहायता भी नहीं मिल सकी, जिसके बाद वे मरीज को जॉलीग्रांट स्थित अस्पताल ले जाने के लिए रवाना हुए। हालांकि रास्ते में ही भरत भंडारी ने दम तोड़ दिया।
घटना के बाद स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर बहस तेज हो गई है। खासकर यह सवाल उठ रहे हैं कि गंभीर अवस्था में रेफर होकर पहुंचे मरीजों के लिए आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था कितनी प्रभावी है और ऐसे मामलों में अस्पतालों के बीच समन्वय किस स्तर पर काम कर रहा है।
इस मामले में पौड़ी के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. शिव मोहन शुक्ला का बयान भी चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा कि एम्स राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण टर्शियरी केयर सेंटर है, लेकिन कई बार समन्वय की स्थिति संतोषजनक नहीं रहती। उनका कहना है कि रेफर मरीजों को लेकर बेहतर तालमेल और स्पष्ट व्यवस्था की आवश्यकता है, ताकि मरीजों को समय पर उपचार मिल सके।
घटना के बाद विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने भी सवाल उठाए हैं।उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। उनका कहना है कि राज्य के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान में पहुंचने वाले गंभीर मरीजों को कम से कम प्राथमिक उपचार और आपात सहायता अवश्य मिलनी चाहिए।
वहीं एम्स ऋषिकेश प्रशासन ने इस घटना पर दुख व्यक्त किया है। संस्थान के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. संदीप कुमार ने कहा कि एम्स वास्तविक परिस्थितियों का आकलन करेगा। उन्होंने स्वीकार किया कि संस्थान में लंबे समय से बेड की उपलब्धता को लेकर दबाव बना रहता है। उनके अनुसार राज्य के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में मरीज एम्स पहुंचते हैं, जिसके कारण संसाधनों पर अतिरिक्त भार पड़ता है। उन्होंने कहा कि भविष्य की जरूरतों को देखते हुए संस्थान के विस्तार और अतिरिक्त सुविधाओं के विकास के लिए राज्य एवं केंद्र सरकार के सहयोग की आवश्यकता है।
यह घटना केवल एक मरीज की मौत का मामला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की रेफरल स्वास्थ्य व्यवस्था, अस्पतालों की क्षमता और आपातकालीन चिकित्सा प्रबंधन की चुनौतियों को भी उजागर करती है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मामले की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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