

जिस जमीन पर कुछ नहीं उगता था, वहां हुआ ऐसा चमत्कार कि 6 साल में गायब हो गई 85 टन CO₂!
बाजार से 2 डिग्री कम रहता है यहां का तापमान, बांस और आंवला निकले सबसे दमदार कार्बन शोषक, वैज्ञानिकों का दावा- पूरे उत्तराखंड में लागू हो मॉडल तो मिल सकता है कार्बन क्रेडिट का भी फायदा
श्रीनगर (गढ़वाल)। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के बुघाणी रोड स्थित चित्रा गार्डन ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में एक नायाब उदाहरण पेश किया है। कभी सूखी और पथरीली बंजर पड़ी विश्वविद्यालय की 3.5 हेक्टेयर भूमि को हरा-भरा मिश्रित वन बनाकर तैयार किया गया, जिसने महज छह वर्षों में करीब 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर सुरक्षित रूप से संग्रहित कर लिया है।
यह पूरा प्रयोग वर्ष 2020 से शुरू हुआ था, जब गढ़वाल विवि की तत्कालीन कुलपति प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल के मार्गदर्शन में उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) के निदेशक डॉ. विजय कांत पुरोहित तथा अनुरक्षण विभाग के सहायक अभियंता महेश डोभाल ने इस बंजर भूमि को संवारने का बीड़ा उठाया था। आज इसी भूमि पर करीब 2,500 पेड़ और 40 से ज्यादा प्रजातियों वाला समृद्ध जंगल खड़ा हो चुका है। यहां जामुन, शहतूत, आंवला, बेल, बांज, बांस, सेब और खुबानी जैसी फलदार व स्थानीय प्रजातियों को घने मिश्रित वृक्षारोपण मॉडल के आधार पर रोपा गया है।
हैप्रेक निदेशक डॉ. विजयकांत पुरोहित के मुताबिक, हाल ही में हुए वैज्ञानिक सर्वेक्षण में इस वन क्षेत्र में करीब 23 टन कार्बन संचित पाया गया, जो लगभग 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर बैठता है। वैज्ञानिक डॉ. राजीव वशिष्ठ ने बताया कि यह जंगल हर साल औसतन 14 टन कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण से खींचकर अवशोषित कर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इस कुल कार्बन संग्रहण में शहतूत और जामुन की प्रजातियों का योगदान करीब 58 प्रतिशत है, जबकि डेंकन और आंवला को जोड़ने पर सिर्फ चार प्रजातियां ही लगभग 80 प्रतिशत कार्बन संग्रहण के लिए जिम्मेदार निकलीं। प्रति पौधे के आधार पर देखा जाए तो बांस और परिपक्व आंवले के पेड़ सबसे ज्यादा असरदार कार्बन अवशोषक साबित हुए हैं।
हैप्रेक के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुदीप सेमवाल का कहना है कि अगर चित्रा गार्डन जैसा यह मिश्रित वन मॉडल उत्तराखंड की एक हजार हेक्टेयर बंजर जमीन पर अपनाया जाए तो करीब 24 हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड सुरक्षित रूप से संग्रहित की जा सकती है। यदि इसका दायरा एक लाख हेक्टेयर तक बढ़ाया जाए तो यह आंकड़ा करीब 24 लाख टन तक पहुंच सकता है, जिससे आगे चलकर कार्बन क्रेडिट के जरिए राज्य को आर्थिक लाभ भी हो सकता है।
इस मॉडल का असर सिर्फ कार्बन अवशोषण तक सीमित नहीं है। शोधार्थी जयदेव चौहान के अनुसार चित्रा गार्डन का तापमान श्रीनगर बाजार क्षेत्र की तुलना में करीब 2 डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है। साथ ही यहां पक्षियों, तितलियों और मधुमक्खियों की तादाद में भी उल्लेखनीय इजाफा देखा गया है। अब तक इस गार्डन के जरिए 250 से अधिक किसानों और विद्यार्थियों को जैव विविधता, औषधीय पौधों और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण से जुड़ा प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है। पेड़ों की मोटाई और ऊंचाई नापकर ही कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन की यह गणना की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल उत्तराखंड की अन्य बंजर भूमियों को भी हरे-भरे क्षेत्रों में तब्दील करने के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है।

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