

ठेकेदारों का सब्र का बांध टूटा, राज्यव्यापी आंदोलन की तैयारी।
मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप कर मामले को गंभीरता पूर्वक लेने के लिए निवेदन किया।
देहरादून। देवभूमि जल शक्ति कांट्रेक्टर वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से आज एक प्रेस वार्ता का आयोजन सहारनपुर रोड स्थित एक होटल में किया गया। प्रेस वार्ता का मुख्य उद्देश्य “जल जीवन मिशन के अंतर्गत पूर्ण एवं प्रगतिरत योजनाओं के सापेक्ष ठेकेदारों के विगत लगभग ढाई वर्षों से लंबित देयकों का भुगतान तत्काल सुनिश्चित किए जाने के सन्दर्भ में रहा।
प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए देवभूमि जल शक्ति कांट्रेक्टर वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष अमित अग्रवाल ने कहा “हर घर नल से जल” माननीय प्रधानमंत्री जी की एक अत्यंत महत्वाकांक्षी एवं जनकल्याणकारी योजना है। राज्य सरकार के नेतृत्व एवं संबंधित विभाग के निरंतर प्रयासों से इस योजना के अंतर्गत राज्य में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार 92.46 प्रतिशत कार्य पूर्ण किए जा चुके हैं। कुल 16,555 योजनाओं में से 15,540 योजनाएँ पूर्ण हो चुकी हैं तथा 14.48 लाख परिवारों में से 14.20 लाख परिवारों को पेयजल कनेक्शन उपलब्ध कराया जा चुका है। यह उपलब्धि राज्य सरकार, विभागीय अधिकारियों तथा इन योजनाओं को धरातल पर उतारने वाले ठेकेदारों के सामूहिक प्रयास का परिणाम है।
परंतु अत्यंत गंभीर एवं चिंताजनक स्थिति यह है कि इन योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ठेकेदारों के वैध देयकों का भुगतान विगत लगभग ढाई वर्षों से लंबित है। ठेकेदारों ने विभागीय निर्देशों के अनुरूप अपने निजी संसाधनों, बैंक ऋण एवं बाजार से प्राप्त उधार के माध्यम से सामग्री, श्रमिक, मशीनरी, परिवहन तथा अन्य आवश्यक व्यय वहन करते हुए कार्य पूर्ण किए हैं। इसके बावजूद पूर्ण किए गए कार्यों के सापेक्ष देय धनराशि का समय पर भुगतान नहीं किया जा रहा है।
यह स्थिति अब मात्र भुगतान में विलंब का विषय नहीं रह गई है, बल्कि ठेकेदारों की कार्यशील पूंजी, बैंकिंग दायित्वों तथा उनके व्यवसायिक अस्तित्व से जुड़ा गंभीर वित्तीय संकट बन चुकी है। ठेकेदार लगातार संबंधित अधिकारियों एवं शासन स्तर पर अपने लंबित भुगतान के संबंध में अनुरोध करते आ रहे हैं। उन्हें बार-बार यह आश्वासन दिया जाता रहा है कि धनराशि उपलब्ध होते ही भुगतान कर दिया जाएगा, किंतु लगभग ढाई वर्ष बीत जाने के बाद भी इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
माननीय मुख्यमंत्री जी, यह अत्यंत विचारणीय प्रश्न है कि जब शासन एवं विभाग ठेकेदारों से निर्धारित समयसीमा में कार्य पूर्ण कराने के लिए निरंतर दबाव बना सकते हैं, तो उन्हीं ठेकेदारों द्वारा पूर्ण किए गए कार्यों के विरुद्ध स्वीकृत एवं वैध देयकों का समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करना शासन की जिम्मेदारी क्यों नहीं माना जा रहा है? क्या यह प्रशासनिक एवं वित्तीय दृष्टि से उचित है कि ठेकेदार से शत-प्रतिशत कार्य पूर्ण करने की अपेक्षा की जाए, किंतु उसके द्वारा किए गए शत-प्रतिशत कार्य के भुगतान के लिए उसे वर्षों तक प्रतीक्षा करने के लिए विवश किया जाए?
एक ओर विभागीय स्तर पर कार्य शीघ्र पूर्ण कराने हेतु नोटिस, पेनल्टी, अनुबंध निरस्तीकरण, प्रतिभूति जब्ती एवं ब्लैकलिस्टिंग जैसी कार्यवाहियों की चेतावनी दी जाती है, वहीं दूसरी ओर ठेकेदारों के वैध देयकों का भुगतान वर्षों तक लंबित रखा जाता है। यह व्यवस्था प्रशासनिक संतुलन तथा अनुबंधीय दायित्वों की भावना के अनुरूप नहीं है।
भुगतान में इस प्रकार की दीर्घ अवधि तक देरी के कारण ठेकेदारों पर बैंक ऋण एवं ब्याज, श्रमिकों की मजदूरी, सामग्री आपूर्तिकर्ताओं की देनदारी तथा अन्य वित्तीय दायित्वों का लगातार बोझ बढ़ रहा है। देय राशि पर बढ़ता वित्तीय भार ठेकेदारों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर रहा है और भविष्य में योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
माननीय मुख्यमंत्री जी, दिनांक 13.08.2026 को जल जीवन मिशन की समीक्षा के संबंध में आयोजित बैठक में योजनाओं को शीघ्र पूर्ण करने तथा शेष कार्यों में तेजी लाने पर विशेष बल दिया गया। यह निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। किंतु यह अत्यंत खेदजनक है कि जिन ठेकेदारों ने अपने संसाधन लगाकर इन योजनाओं को धरातल पर उतारा है, उनके वर्षों से लंबित भुगतान के विषय को भी समान गंभीरता एवं प्राथमिकता के साथ संबोधित किया जाना आवश्यक था।

जब तक ठेकेदारों की कार्यशील पूंजी उपलब्ध नहीं होगी और उनके पूर्व में किए गए कार्यों के वैध भुगतान का निस्तारण नहीं होगा, तब तक उनसे निरंतर नए कार्यों में अपेक्षित गति बनाए रखने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। इसके अतिरिक्त, अनेक योजनाओं में विलंब ठेकेदारों के नियंत्रण से बाहर के कारणों, जैसे वन विभाग की अनुमति, रेलवे से संबंधित अनुमति, भूमि संबंधी विषय, विभागीय स्वीकृति अथवा अन्य तकनीकी एवं प्रशासनिक कारणों से भी होता है। ऐसी परिस्थितियों में यदि बिना वस्तुनिष्ठ परीक्षण के सम्पूर्ण विलंब का दायित्व ठेकेदार पर डालकर दंडात्मक कार्यवाही की जाती है, तो यह न्यायसंगत नहीं होगा।
अतः आपसे अनुरोध है कि इस गंभीर विषय पर तत्काल हस्तक्षेप करते हुए निम्नलिखित कार्यवाही सुनिश्चित करने हेतु संबंधित विभाग को स्पष्ट निर्देश प्रदान किए जाएँ—
- जल जीवन मिशन के अंतर्गत पूर्ण एवं विभागीय रूप से सत्यापित समस्त कार्यों के लंबित देयकों का जनपदवार एवं प्रभागवार विवरण तैयार कर प्राथमिकता के आधार पर तत्काल भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
- जिन योजनाओं के रनिंग बिल अथवा अंतरिम देयक विभागीय स्तर पर लंबित हैं, उनका परीक्षण पूर्ण कर निश्चित समयसीमा के भीतर भुगतान कराया जाए।
- लगभग ढाई वर्षों से लंबित भुगतानों के संबंध में शासन स्तर पर विशेष समीक्षा बैठक आयोजित कर प्रत्येक लंबित देयक के निस्तारण की समयसीमा निर्धारित की जाए तथा संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
- जब तक ठेकेदारों के वैध एवं देय भुगतान का निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक केवल भुगतान में विलंब के कारण प्रभावित कार्यों के संबंध में ठेकेदारों के विरुद्ध अनावश्यक दंडात्मक कार्यवाही, अनुबंध निरस्तीकरण, प्रतिभूति जब्ती अथवा ब्लैकलिस्टिंग जैसी कार्यवाही से पूर्व वस्तुनिष्ठ समीक्षा की जाए।
- जिन कार्यों में विलंब ठेकेदार के नियंत्रण से बाहर के कारणों से हुआ है, उनमें तथ्यों की निष्पक्ष जाँच किए बिना ठेकेदार को उत्तरदायी न ठहराया जाए तथा आवश्यकतानुसार अनुबंध की शर्तों के अनुसार उचित समय-विस्तार प्रदान किया जाए।
- केंद्र से धनराशि प्राप्त होने की प्रतीक्षा में ठेकेदारों के वैध देयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित न रखा जाए। आवश्यकता होने पर राज्य स्तर पर उपलब्ध वित्तीय संसाधनों से अंतरिम व्यवस्था कर भुगतान सुनिश्चित किया जाए, ताकि योजनाओं का कार्य प्रभावित न हो।
- भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति रोकने के लिए यह सुनिश्चित किया जाए कि कार्यादेश जारी करने, कार्य निष्पादन एवं भुगतान की वित्तीय व्यवस्था में समुचित समन्वय हो तथा ठेकेदारों के स्वीकृत देयकों के भुगतान के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित हो।
माननीय मुख्यमंत्री जी, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ठेकेदार सरकार से किसी प्रकार की अनुकंपा अथवा अतिरिक्त आर्थिक लाभ की मांग नहीं कर रहे हैं। वे केवल उस कार्य की वैधानिक एवं अनुबंधित धनराशि मांग रहे हैं, जिसे उन्होंने शासन एवं विभाग के निर्देशानुसार अपने संसाधनों से पूर्ण किया है।
यदि शासन एवं विभाग को योजनाएँ निर्धारित समयसीमा में पूर्ण करानी हैं, तो उसी प्रकार पूर्ण किए गए कार्यों का समयबद्ध भुगतान करना भी शासन एवं विभाग का दायित्व है। वर्षों तक भुगतान लंबित रखकर ठेकेदारों से लगातार कार्य कराने की अपेक्षा न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायसंगत।
अतः आपसे दृढ़तापूर्वक अनुरोध एवं आग्रह है कि उक्त विषय को तत्काल उच्च प्राथमिकता प्रदान करते हुए संबंधित विभाग को आवश्यक एवं बाध्यकारी निर्देश जारी किए जाएँ तथा लंबित भुगतानों के निस्तारण की निश्चित समयसीमा शासन स्तर पर निर्धारित की जाए।
यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो भुगतान के अभाव में ठेकेदारों की कार्यशील पूंजी पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिसके परिणामस्वरूप योजनाओं की प्रगति भी प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों का संपूर्ण दायित्व केवल ठेकेदारों पर डालना न्यायोचित नहीं होगा। अतः अपेक्षा है कि माननीय मुख्यमंत्री जी इस विषय की गंभीरता को दृष्टिगत रखते हुए व्यक्तिगत स्तर पर संज्ञान लेकर लंबित भुगतानों के शीघ्र निस्तारण हेतु आवश्यक कार्यवाही सुनिश्चित करने की कृपा करेंगे।

अमित अग्रवाल ने कहा जहां कई राज्यों में ठेकेदार भाई लोग कपड़े उतार उतार कर सड़क पर आ रहे हैं और अपना विरोध दर्ज कर रहे हैं वही उत्तराखंड में अभी भी ठेकेदार भाइयों ने सब्र कर रखा है और शांति पूर्वक भुगतान की मांग कर रहे हैं। हमारे संगठन ने मुख्यमंत्री से कई बार मिलने की गुहार लगाई परंतु मुख्यमंत्री जी ने हमें अभी तक हमसे न मिले है और ना ही हमारी समस्यों को हल किया हैं।
प्रेस वार्ता में जितेंद्र मलिक, गौरव गोयल, रजत सिंघल, आशुतोष सक्सैना, ध्रुव जोशी, जगजीत, मनोज भारद्वाज, सुनील गुप्ता, सचिन मित्तल, अमित अग्रवाल, सुनील प्रकाश मित्तल, अंकित सलार, शुभम तोमर, संदीप मित्तल एवं अन्य लोग मौजूद रहे।

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