

देहरादून। भारत और नेपाल के अधिकारियों के बीच देहरादून में 14वीं संयुक्त कार्य समूह बैठक का आगाज हो गया है। दो दिवसीय इस बैठक में गुरुवार और शुक्रवार यानी 20 और 21 अगस्त को कुल चार दौर की वार्ता प्रस्तावित है। पहले दौर की चर्चा में गृह मंत्रालय, आईटीबीपी, एसएसबी तथा सर्वे ऑफ इंडिया के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। गौरतलब है कि इससे पहले दोनों देशों के बीच बैठक नेपाल के पोखरा शहर में हुई थी, जिसके क्रम में अब यह अगला दौर देहरादून की धरती पर आयोजित किया जा रहा है।
बैठक के पहले सत्र में सीमा विवाद के निपटारे, सीमा प्रबंधन व्यवस्था और दोनों मुल्कों के बीच व्यापारिक रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने पर मंथन हुआ। सीमा-रेखा तय करने से जुड़े पुराने दस्तावेजों और मानचित्रों की पड़ताल इस बैठक की मुख्य कड़ी रहेगी, जिसमें अंग्रेजों के जमाने के सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों को भी खंगाला जा सकता है। पुराने अभिलेखों को वर्तमान भौगोलिक स्थिति से मिलाकर विवादित इलाकों पर सहमति बनाने की कोशिश की जाएगी।
बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे दोनों देशों के अधिकारी बुधवार देर रात मसूरी रोड स्थित एक होटल में ठहरे, जहां रात्रिभोज पर औपचारिक भेंट भी हुई। इससे पहले 14 अगस्त को लखनऊ में हुए समन्वय सम्मेलन में भारत-नेपाल के सर्वे विभागों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में खेती, निर्माण व भूमि की सही तस्वीर जानने के लिए आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर रजामंदी जताई थी, जिसमें ड्रोन-आधारित हवाई सर्वे और जमीनी आंकड़ों का संयुक्त विश्लेषण शामिल है। देहरादून की मौजूदा बैठक में इन्हीं तकनीकी पहलुओं पर आगे की रणनीति तय होने की उम्मीद है।
गौरतलब है कि भारत-नेपाल सीमा की कुल लंबाई करीब 1,751 किलोमीटर है, जो भारत के कई राज्यों को छूती है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जिलों समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों की सीमाएं नेपाल से सटी हैं, जहां सदियों से आवाजाही और कारोबार होता आया है। दोनों पक्षों की मंशा है कि सीमा विवाद सुलझाने की कवायद में स्थानीय व्यापार और लोगों की आवाजाही प्रभावित न हो, यही कारण है कि इस दो दिवसीय बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है।

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