

देहरादून/श्रीनगर उत्तराखंड को उसकी स्थाई राजधानी गैरसैण दिलाने का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। ‘स्थाई राजधानी गैरसैण समिति’ के बैनर तले शुरू हुई संकल्प पदयात्रा अब और आक्रामक रूप ले चुकी है। 15 अगस्त को देहरादून स्थित अस्थाई विधानसभा से शुरू हुआ यह पैदल आंदोलन 125 किलोमीटर का सफर तय कर मलेथा होते हुए श्रीनगर की ओर बढ़ चला है। 275 किलोमीटर के लंबे लक्ष्य में से करीब 150 किलोमीटर की दूरी अभी बाकी है, लेकिन पदयात्रियों का हौसला बुलंद है।
मलेथा में मातृशक्ति का उग्र तेवर, गूंजे तीखे नारे पदयात्रा के मलेथा पहुंचने पर स्थानीय महिलाओं ने पदयात्रियों का पारंपरिक एवं भव्य स्वागत किया। हालांकि, इस स्वागत के पीछे पहाड़ की उपेक्षा को लेकर महिलाओं का गहरा गुस्सा भी देखने को मिला। क्षेत्र में “सुन ले धामी—गैरसैण, सुन ले मोदी—गैरसैण” के नारों से माहौल गूंज उठा।
स्थानीय महिलाओं ने आंदोलनकारियों से संवाद करते हुए अपनी तकलीफें साझा कीं:
- बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं: गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आज भी दूर-दराज के बड़े शहरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
- चरमराती शिक्षा प्रणाली: पर्वतीय क्षेत्रों के स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों का अभाव।
- बढ़ती बेरोजगारी: रोजगार के अवसरों की कमी के कारण पहाड़ों से लगातार पलायन।

विरोध का अनोखा तरीका: कराया था सामूहिक मुंडन सरकार की उपेक्षा और उदासीन रवैये के खिलाफ समिति के सदस्यों ने 13 अगस्त को ही सामूहिक मुंडन कराकर अपना विरोध प्रकट कर दिया था। आंदोलनकारियों का साफ कहना है कि यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि हक और वजूद की लड़ाई है।
पूर्व IAS अधिकारी संभाल रहे हैं कमान उत्तराखंड शासन के पूर्व सचिव एवं रिटायर्ड IAS अधिकारी विनोद प्रसाद रतूड़ी इस पूरी यात्रा का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके साथ 76 वर्षीय वयोवृद्ध आंदोलनकारी गोपाल दत्त कुमेड़ी, रामेश्वर शर्मा, सुधीर गैरौला, दान सिंह मिंगवाल, नारायण सिंह बिष्ट, विनोद चौहान और दयाल सिंह राणा जैसे प्रमुख चेहरे कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं। यह दल गांव-गांव जाकर लोगों को गैरसैण के मुद्दे पर लामबंद कर रहा है।
गैरसैण पहुंचते ही ‘आर-पार’ की लड़ाई समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि 275 किमी का सफर पूरा कर जैसे ही यह यात्रा गैरसैण पहुंचेगी, वहां अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया जाएगा। “प्रण से प्राण तक—राजधानी गैरसैण” के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे इन कदमों ने एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति और सत्ता के गलियारों में हलचल तेज कर दी है।

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