

राजनीतिक विश्लेषण
उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा मुकाबला देखने को मिल रहा है, जिसे देखकर क्रिकेट प्रेमियों को भी शक हो जाए कि कहीं यह मैच टॉस से पहले ही तो तय नहीं हो गया था?
मैदान में एक तरफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरक सिंह रावत हैं और दूसरी तरफ उनकी पुत्रवधू अनुकृति गुसाईं, जो अब भाजपा की प्रदेश प्रवक्ता हैं। रिश्ते घर के वही हैं, लेकिन राजनीतिक जर्सी बदल चुकी है। ससुर कांग्रेस के लिए बल्लेबाजी कर रहे हैं और बहू भाजपा की ओर से जवाबी गेंदबाजी।
अगस्त 2026 में भाजपा ने अनुकृति गुसाईं को प्रदेश प्रवक्ता की जिम्मेदारी दी। इसके बाद राजनीतिक समीकरण और दिलचस्प हो गए। अब वह भाजपा की ओर से कांग्रेस पर हमलावर हैं, जबकि हरक सिंह रावत कांग्रेस के चुनावी मोर्चे पर सक्रिय हैं।
18 सितंबर को मामला तब और गरम हुआ, जब हरक सिंह रावत ने दावा किया कि अनुकृति को ईडी के डर से भाजपा में जाना पड़ा। जवाब में अनुकृति ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि वह राष्ट्रवाद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विचारधारा से प्रभावित होकर भाजपा में आई हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके ससुर से ऐसा बयान कांग्रेस के दबाव में दिलवाया जा रहा है। ये आरोप-प्रत्यारोप दोनों पक्षों के सार्वजनिक बयान हैं, जिनकी अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं हैं।
अब जरा कहानी का पुराना अध्याय भी खोलिए।
हरक सिंह रावत का राजनीतिक सफर खुद उत्तराखंड की राजनीति की एक अलग किताब है। 1991 में भाजपा से शुरुआत, बाद में बसपा, फिर कांग्रेस, 2016 में कांग्रेस के बागी विधायकों के साथ भाजपा और 2022 में फिर कांग्रेस, इतने राजनीतिक मोड़ तो पहाड़ की सड़क में भी हर किलोमीटर पर नहीं आते!
यही वजह है कि जब आज बहू और ससुर अलग-अलग पार्टियों की तरफ से एक-दूसरे के राजनीतिक खेमे पर निशाना साधते हैं, तो जनता का सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह वास्तविक राजनीतिक टकराव है या चुनावी मौसम की नूरा-कुश्ती?
फिलहाल किसी कथित ‘फिक्स मैच’ की कोई सार्वजनिक पुष्टि नहीं है। इसलिए इसे सच मान लेना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजनीति में सवालों की उम्र अक्सर जवाबों से ज्यादा लंबी होती है।
और सवाल बड़ा सीधा है।
अगर बहू भाजपा की प्रवक्ता बनकर कांग्रेस पर हमला करें और ससुर कांग्रेस के मंच से भाजपा की राजनीति को घेरें, तो क्या इसे सिर्फ पारिवारिक लोकतंत्र माना जाए या इसके पीछे दोनों की अलग-अलग राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है?
यहां मजेदार बात यह भी है कि दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक हित में बेहद उपयोगी दिखाई दे सकते हैं। भाजपा को एक ऐसा चेहरा मिलता है जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के परिवार से आता है और कांग्रेस को हरक सिंह जैसा अनुभवी नेता मिलता है, जिसका राजनीतिक अतीत खुद कई दलों और कई दौरों से होकर गुजरा है।
यानी परिवार एक, राजनीतिक मंच दो और बयानबाजी चार!
अब जनता को तय करना है कि वह इसे गंभीर राजनीतिक मतभेद मानती है, पारिवारिक राजनीतिक स्वतंत्रता या फिर चुनावी मौसम की ऐसी ‘नूरा-कुश्ती’, जिसमें दोनों तरफ से दांव असली दिखते हैं लेकिन दर्शक को आखिरी राउंड का इंतजार रहता है।
क्योंकि उत्तराखंड की जनता अब केवल भाषण नहीं सुनती।
वह राजनीतिक इतिहास भी पढ़ती है।
और हरक सिंह रावत का इतिहास तो खास तौर पर पढ़ना पड़ेगा—
क्योंकि उनकी राजनीति में ‘पार्टी बदलना’ कोई फुटनोट नहीं, पूरी कहानी का एक अध्याय रहा है।
इसलिए इस बहू-ससुर मुकाबले का असली फैसला आज नहीं होगा।
फैसला तब होगा जब चुनावी धूल बैठेगी और पता चलेगा कि कौन किसके साथ खड़ा रहा, किसने क्या कहा और किस बयान का राजनीतिक फायदा किसे मिला।
और आखिर में सवाल सिर्फ इतना है कि बहू भाजपा की प्रवक्ता और ससुर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता क्या यह महज पारिवारिक लोकतंत्र है या उत्तराखंड की राजनीति का कोई नया प्रयोग?
क्योंकि हरक सिंह रावत की राजनीति को देखते हुए ‘असंभव’ शब्द पर भरोसा करना थोड़ा जोखिम भरा काम है। जिस नेता ने राजनीतिक सफर में कई बार पाला बदला हो, उनके मामले में आज की राजनीतिक दूरी और कल की राजनीतिक नजदीकी के बीच ज्यादा लंबा फासला मान लेना भी समझदारी नहीं होगी।
फिलहाल बहू भाजपा के खेमे से ससुर की राजनीति को जवाब दे रही हैं और ससुर कांग्रेस के खेमे से भाजपा पर निशाना साध रहे हैं। जनता दर्शक दीर्घा में बैठी है और मैच बड़े ध्यान से देख रही है।
लेकिन असली मजा तो चुनाव के बाद आएगा।
अगर दोनों अपनी-अपनी राजनीतिक जर्सी में पूरी ईमानदारी से टिके रहे तो जनता कहेगी वाह, परिवार एक और विचारधारा अलग!
और अगर चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक जर्सियां फिर बदल गईं, तो जनता शायद टिकट लेकर दोबारा मैच देखने के बजाय सीधे अंपायर से पूछे,
“भाई साहब, ये क्रिकेट है या पारिवारिक व्यवसाय?”
वैसे हरक सिंह रावत की राजनीति का रिकॉर्ड देखते हुए एक बात तो तय है, उत्तराखंड में मौसम कब बदलेगा, इसका अनुमान मौसम विभाग लगा सकता है; लेकिन
हरक सिंह की राजनीति में अगली करवट कब आएगी, इसकी भविष्यवाणी शायद मौसम विभाग भी करने से पहले इस्तीफा दे दे!
फिलहाल बहू-ससुर आमने-सामने हैं।
गेंद भाजपा के पाले में है, बल्ला कांग्रेस के हाथ में है और जनता की नजर स्कोरबोर्ड पर।
अब देखना सिर्फ इतना है कि मैच 20-20 है, टेस्ट है या फिर…
“फिक्स मैच का रिजल्ट चुनाव के बाद खुलेगा!”

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