बीमारी से लड़ते हुए रंगों से रची नई ज़िंदगी — ‘दानू पहाड़ी शेर’ की जिद और हुनर की कहानी

बागेश्वर/कपकोट। कहते हैं कला किसी डिग्री की मोहताज नहीं होती, वह तो इंसान की उँगलियों और दिल के बीच पलने वाली एक ख़ामोश ताक़त है। कपकोट, बागेश्वर के रहने वाले भजन सिंह—जिन्हें सोशल मीडिया आज “दानू पहाड़ी शेर” के नाम से जानता है—इस बात का जीता-जागता प्रमाण हैं। बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और संघर्ष के दम पर ऐसा मुकाम बनाया कि आज लोग उन्हें “आदमी को देखकर हूबहू तस्वीर उतार देने वाला किंग” कहकर पुकारते हैं।

भजन सिंह का बचपन साधारण पहाड़ी परिवार में बीता। महज़ दस साल की उम्र से उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ कमीशन पर स्केच बनाने शुरू कर दिए थे। स्कूल की कॉपियों के हाशिये से शुरू हुई उनकी कला धीरे-धीरे लोगों के चेहरों तक पहुँच गई। बारहवीं तक पढ़ाई करने के बाद रोज़गार की तलाश उन्हें मुंबई ले गई, जहाँ उन्होंने लगभग पंद्रह साल नौकरी की। ज़िंदगी पटरी पर थी, सपने आकार ले रहे थे, लेकिन 1 अगस्त 2024 का दिन उनके जीवन का सबसे कठिन मोड़ बन गया।

घर लौटते समय ट्रेन में अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी। घर पहुँचते-पहुंचते हालत इतनी गंभीर हो गई कि सीधे अस्पताल ले जाना पड़ा। जाँच में मलेरिया और पीलिया की पुष्टि हुई। पाँच दिन आईसीयू में रहने के बाद वे संभले ही थे कि एक महीने बाद फिर वही बीमारियाँ लौट आईं। अगले नौ महीनों में बार-बार मलेरिया, पीलिया, टायफायड और अन्य संक्रमणों ने उन्हें जकड़ लिया। चार बार गंभीर हालत में भर्ती होना पड़ा। दवाइयों का बोझ इतना बढ़ा कि मानसिक तनाव भी हावी होने लगा।
इसी दौर में उनकी नौकरी छूट गई। घर में कमाने वाले अकेले व्यक्ति वही थे, इसलिए आर्थिक संकट गहराता चला गया। कई बार तो दवाइयाँ खरीदने तक के पैसे नहीं बचते थे। पत्नी ने सिलाई का काम शुरू किया, मगर सीमित आमदनी से परिवार चलाना कठिन हो रहा था। ऐसे अँधेरे समय में उन्हें अपनी पुरानी साथी—कला—याद आई।

भजन सिंह बताते हैं, “जब दवाइयों से दिमाग भारी रहने लगा, तब लगा कि खुद को बचाने के लिए फिर से रंगों से दोस्ती करनी होगी।” उन्होंने लोगों के स्केच बनाने शुरू किए—शुरुआत बिल्कुल मुफ्त में। धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर उनके बनाए चित्र वायरल होने लगे। फेसबुक और यूट्यूब चैनल “दानू पहाड़ी शेर” पर लोग उनके हुनर के मुरीद बनते गए। किसी की माँ का चित्र, किसी बच्चे की मुस्कान, किसी बुज़ुर्ग का चेहरा—उनकी पेंसिल से उतरते ही जीवंत हो उठता है।

लोगों का प्यार इतना मिला कि कई प्रशंसकों ने स्वेच्छा से उन्हें इनाम और सहयोग राशि भेजनी शुरू कर दी। इसी सहारे घर को थोड़ी राहत मिली। आज भजन सिंह तय कर चुके हैं कि वे पूरी तरह घर पर रहकर आर्ट को ही अपना पेशा बनाएंगे। उनका सपना है कि पहाड़ के युवाओं को भी यह सिखाएँ कि हुनर सबसे बड़ी पूँजी है।

वे भावुक होकर कहते हैं, “मैंने कोई आर्ट स्कूल नहीं देखा, मेरी गुरु मेरी मेहनत रही है। बीमारी ने बहुत कुछ छीना, लेकिन कला ने मुझे फिर से खड़ा कर दिया। सोशल मीडिया के हर उस साथी का दिल से आभारी हूँ जिसने मुझे पहचान और हौसला दिया।”

आज “दानू पहाड़ी शेर” सिर्फ एक यूट्यूब चैनल नहीं, बल्कि संघर्ष से जीत की मिसाल बन चुका है। यह कहानी बताती है कि जब इंसान टूटकर भी अपने हुनर का हाथ थाम ले, तो तकलीफ़ें भी हार मान लेती हैं। कपकोट की वादियों से निकला यह कलाकार अब पूरे देश में अपनी पहचान गढ़ रहा है—सिर्फ पेंसिल और हौसले के दम पर।

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