देहरादून / नई दिल्ली। उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की गूंज आज देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर सुनाई दी, लेकिन इस शांतिपूर्ण सत्याग्रह को दबाने के लिए पुलिस ने पूरी ताकत झोंक दी। जंतर-मंतर पर सीबीआई की लचर पैरवी के खिलाफ प्रदर्शन करने जा रहे उत्तराखंड कांग्रेस के उपाध्यक्ष और पूर्व मंत्री धीरेंद्र प्रताप को दिल्ली पुलिस ने नाटकीय घटनाक्रम के बीच गिरफ्तार कर लिया। उन्हें संसद मार्ग थाने में चार घंटे से अधिक समय तक अवैध हिरासत में रखा गया। इस दौरान धीरेंद्र प्रताप के मोबाइल फोन और अन्य संचार साधन छीनकर उन्हें पूरी दुनिया से काट दिया गया। पुलिस ने उन्हें उनके वकील तक से बात करने की अनुमति नहीं दी, जिसे उन्होंने मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन और लोकतंत्र की हत्या करार दिया है।
धीरेंद्र प्रताप ने हिरासत से मुक्त होने के बाद आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि कांग्रेस शासन में आंदोलन करने की पूरी आजादी थी, लेकिन वर्तमान सरकार में शांतिपूर्ण गांधीवादी सत्याग्रह तक का अधिकार छीन लिया गया है। पुलिस द्वारा धारा 144 और अनुमति न होने का हवाला देकर की गई इस कार्रवाई को उन्होंने असंवैधानिक बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे संविधान और कानून को मानने वाले नागरिक हैं, लेकिन उनके मौलिक अधिकारों को कुचलकर उन्हें जबरन अपराधी की तरह थाने में बिठाया गया।

दूसरी ओर, इस पुलिसिया कार्रवाई के बावजूद आंदोलनकारियों का हौसला नहीं डिगा। महिला मंच की अध्यक्ष कमला पंत के सशक्त नेतृत्व में आंदोलनकारियों के एक बड़े समूह ने जंतर-मंतर के दूसरे गेट पर जोरदार प्रदर्शन किया। इस सत्याग्रह में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष उमाकांत लाखेड़ा, वरिष्ठ पत्रकार देव सिंह रावत, आंदोलनकारी चारु तिवारी, गरिमा दसौनी , अनिल पंत, मनोज जुगराण और दाता राम चमोली समेत चार दर्जन से अधिक प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं। सभी ने एक सुर में अंकिता हत्याकांड की जांच में हो रही ढिलाई और ‘वीआईपी’ को बचाने की कोशिशों का विरोध किया।
सत्याग्रह स्थल पर पारित एक प्रस्ताव में सभी संगठनों ने धीरेंद्र प्रताप की गिरफ्तारी और उन्हें संपर्कविहीन रखने की कड़ी निंदा की। वक्ताओं ने कहा कि यह आंदोलनकारियों के संवैधानिक और मानवाधिकारों का दमन है, जिसे उत्तराखंड का समाज कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। आंदोलनकारियों ने मांग की है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड में संलिप्त रसूखदारों को तुरंत सजा दी जाए और उस ‘वीआईपी’ चेहरे को जेल भेजा जाए जिसके दबाव में न्याय प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है। साझा नेतृत्व ने संकल्प लिया कि जब तक अंकिता को न्याय नहीं मिल जाता, यह लड़ाई दिल्ली से लेकर देहरादून की सड़कों तक जारी रहेगी।


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