
देहरादून/गैरसैंण: उत्तराखंड राज्य आंदोलन के मूल स्वरूप, पहाड़ों से बढ़ते पलायन, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं और 26 सालों से लटकी स्थायी राजधानी गैरसैंण के मुद्दे पर युवा मुखर आवाज पार्थ रतूड़ी ने सियासत और प्रशासन पर जमकर निशाना साधा है। साथ ही, उन्होंने जनता को भी आईना दिखाते हुए कहा कि इस दुर्दशा के लिए हम खुद भी उतने ही जिम्मेदार हैं।
पार्थ रतूड़ी ने कहा, “हमारी सबसे बड़ी समस्या नेता या भ्रष्ट अफसर नहीं, बल्कि हम खुद हैं। जब तक हम इनके सामने गिड़गिड़ाना और इन्हें राजा मानना बंद नहीं करेंगे, ये हमें गुलाम ही समझेंगे।” उन्होंने कहा कि जनता जब तक अपने हक के लिए नहीं उठेगी, तब तक पीढ़ियां सड़कों पर बलिदान देने को मजबूर होती रहेंगी।
रतूड़ी ने कहा कि उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना दुर्गम भूगोल के विकास के लिए की गई थी, लेकिन आज विकास के नाम पर विनाश और भ्रष्टाचार बढ़ा है। सबसे दर्दनाक यह कि पहाड़ों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में आज भी माताएं और नवजात शिशु दम तोड़ रहे हैं। “मातृ-शिशु मृत्यु दर का यह ग्राफ राज्य के नीति-नियंताओं की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है,” उन्होंने कहा।
पिछले 26 सालों में 10 साल कांग्रेस और 15 साल बीजेपी का कार्यकाल पूरा होने को है। रतूड़ी ने माना कि विकास हुआ है, लेकिन वह पहाड़ी राज्य की मूल अवधारणा को ताक पर रखकर किया गया। “देहरादून राज्य का आखिरी कोना है, यहां से शासन हो रहा है, इसलिए सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों तक नीतियां पहुंच ही नहीं पातीं,” उन्होंने आरोप लगाया।
सबसे तीखा हमला जनता की मूक सहमति पर बोलते हुए रतूड़ी ने कहा, “विडंबना देखिए – जब गैरसैंण, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर आवाज उठती है, तो जनता एकजुट नहीं होती। लेकिन किसी पार्टी की रैली में हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती है। क्योंकि आज बहुसंख्यकों को सिर्फ राजनीति और चाटुकारिता से मतलब है, पहाड़ों के ईमानदार विकास से नहीं।”
रतूड़ी ने कहा कि यह राज्य किसी पार्टी की जागीर या मेहरबानी नहीं, बल्कि 42 शहीदों की शहादत की माटी पर खड़ा स्वाभिमानी राज्य है। “गैरसैंण का दीया बुझने वाला नहीं। हमारा संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक गैरसैंण को उसका हक नहीं मिलता।”
उन्होंने जनता से अपील की कि वे अपने बच्चों को राज्य के इतिहास, परंपरा और संघर्ष से अवगत कराएं। “विनोद प्रसाद रतूड़ी के नेतृत्व में 103 दिनों से क्रमिक अनशन चल रहा है, लेकिन वहां जनता नहीं आ रही। अगर जनता ही अपने मुद्दे के लिए नहीं खड़ी हुई, तो सरकार की मनमानी बढ़ती जाएगी और 42 शहीदों का सपना अधूरा रह जाएगा,” उन्होंने कहा।
“जो लोग आंदोलन में शामिल नहीं हो सकते, वे जनजागरूकता फैलाएं। अपने बच्चों को बताएं कि यह राज्य किसी की भीख नहीं, बल्कि शहीदों की शहादत की नींव पर खड़ा है।”
गौरतलब है कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर आंदोलन लंबे समय से जारी है, लेकिन राजनीतिक दलों की ओर से इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई है। पार्थ रतूड़ी का यह बयान राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ सकता है।

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