प्राकृतिक आपदाओं के समक्ष मनुष्य बेबस

म्यांमार में 28 मार्च को रिक्टर स्केल पर आए 7.7 तीव्रता के भूकंप ने भारी तबाही मचाई। म्यांमार और थाईलैंड में यह 200 साल का सबसे भीषण भूकंप बताया गया।
यूनाइटेड स्टेट जियोलॉजिकल सर्वे द्वारा मौतों का आंकड़ा 10 हजार से भी ज्यादा होने की आशंका जताई गई है। भूकंप के झटके थाईलैंड, बांग्लादेश, चीन और भारत तक महसूस किए गए। भूकंप के कारण म्यांमार की दुर्दशा को देखते हुए भारत में भी लोगों के मन में सवाल उमड़ रहे हैं कि कहीं देश के विभिन्न हिस्सों में बार-बार कांपती धरती किसी बड़ी तबाही का सिग्नल तो नहीं है। नेशनल सेंटर ऑफ सिस्मोलॉजी (एनसीएस) के एक अध्ययन में बताया जा चुका है कि 20 भारतीय शहरों तथा कस्बों में भूकंप का खतरा सर्वाधिक है, जिनमें दिल्ली सहित नौ राज्यों की राजधानियां भी शामिल हैं।
हिमालयी पर्वत श्रृंखला क्षेत्र को दुनिया में भूकंप के मामले में सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में जमीन के नीचे दिल्ली-मुरादाबाद फॉल्ट लाइन, मथुरा फॉल्ट लाइन तथा सोहना फॉल्ट लाइन मौजूद है। जहां फॉल्ट लाइन होती है, भूकंप का अधिकेंद्र वहीं बनता है। बड़े भूकंप फॉल्ट लाइन के किनारे ही आते हैं, और दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरी हिमालयन बेल्ट को भूकंप से ज्यादा खतरा है। एनसीएस के पूर्व प्रमुख डॉ. एके शुक्ला के मुताबिक, उत्तर भारत में हिमालयन बेल्ट से ज्यादा खतरा है, जहां 8 की तीव्रता वाले भूकंप आने की शंका है। हालांकि ज्यादा तीव्रता का बड़ा भूकंप आने की आशंकाओं के बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि सटीक अनुमान लगाना संभव नहीं है कि यह कब आ सकता है। दरअसल, भूकंप के सटीक पूर्वानुमान का अब तक न कोई उपकरण है, और न ही कोई मैकेनिज्म।
राष्ट्रीय भू-भौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) के वैज्ञानिक हालांकि बार-बार धरती के कांपने को लेकर अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि भू-जल का गिरता स्तर भी प्रमुख वजह के रूप में सामने आ रहा है जबकि अन्य कारण भी तलाशे जा रहे हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून तथा आईआईटी, कानपुर भी दिल्ली तथा आसपास के इलाकों का अध्यनन करते हुए एनसीएस की मदद कर रहे हैं। दिल्ली एनसीआर को तो भूकंप के लिहाज से काफी संवेदनशील इलाका माना जाता है, जो दूसरे नंबर के सबसे खतरनाक सिस्मिक जोन-4 में आता है। एक अध्ययन के मुताबिक, दिल्ली में करीब 90 फीसद मकान कंक्रीट और सरिये से बने हैं, जिनमें से 90 फीसदी इमारतें रिक्टर स्केल पर छह तीव्रता से तेज भूकंप को झेलने में समर्थ नहीं हैं। एनसीएस के एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली का करीब 30 फीसद हिस्सा तो जोन-5 में आता है, जो भूकंप की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भी बताया जा चुका है कि दिल्ली में बनी नई इमारतें 6 से 6.6 तीव्रता के भूकंप को झेल सकती हैं जबकि पुरानी इमारतें 5 से 5.5 तीव्रता का भूकंप ही सह सकती हैं। विशेषज्ञ बड़ा भूकंप आने पर दिल्ली में जान-माल का ज्यादा नुकसान होने का अनुमान इसलिए भी लगा रहे हैं क्योंकि दिल्ली में प्रति वर्ग किमी. में करीब दस हजार लोग रहते हैं, और कोई भी बड़ा भूकंप 300-400 किमी. की रेंज तक असर दिखाता है। भूकंप के झटकों को लेकर दुनिया भर के भूगर्भशास्त्रियों तथा भूकंप विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय धरती की टेक्टोनिक प्लेटें खिसक रही हैं, और उन्हीं के कारण इतने भूकंप आ रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक कई बार जब दो टेक्टोनिक प्लेटों के बीच में बनी गैस या प्रेशर रिलीज होता है, तब भी भूकंप के झटके आते हैं। गर्मिंयों में यह स्थिति ज्यादा देखने को मिलती है। हिमालय में बड़े भूकंप की आशंका जताते हुए वैज्ञानिक  कह चुके हैं कि हिमालय पर्वत श्रृंखला में सिलसिलेवार भूकंपों के साथ कभी भी बड़ा भूकंप आ सकता है, जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर आठ से भी ज्यादा हो सकती है।

भूकंप वैज्ञानिकों के अनुसार 8.5 तीव्रता वाला भूकंप 7.5 तीव्रता के भूकंप के मुकाबले करीब 30 गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समक्ष हालांकि मनुष्य बेबस है क्योंकि ये आपदाएं बगैर चेतावनी के आती हैं, जिससे इनकी मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है लेकिन हम ऐसे प्रबंध तो कर ही सकते हैं, जिनसे भूकंप आने पर नुकसान की आशंका न्यूनतम रहे। जापान ऐसा देश है जहां सबसे ज्यादा भूकंप आते हैं, लेकिन उसने भवन निर्माण और बुनियादी सुविधाओं का ऐसा मजबूत ढांचा विकसित कर लिया है, जिससे भूकंपों के कारण कम नुकसान होता है। रिक्टर स्केल पर 5 तक की तीव्रता वाले भूकंप को खतरनाक नहीं माना जाता लेकिन यह भी क्षेत्र की संरचना पर निर्भर करता है। इसीलिए विशेषज्ञों का कहना है कि नई इमारतों को भूकंपरोधी बना कर तथा पुरानी इमारतों में अपेक्षित सुधार कर जान-माल के बड़े नुकसान से बचा जा सकता है।

(आलेख में वैयक्तिक लेखक के निजी विचार हैं)
(मेरोउत्तराखंड.इन इनका समर्थन नहीं करता है)

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