इस बार भगवान कृष्ण ने एक ब्राह्मण की ओर अपना हाथ बढ़ाते हुए उसे दो कौड़ियां दीं। अर्जुन ने श्री कृष्ण की ओर देखते हुए आश्चर्य से पूछा, “प्रभु, मैंने जो स्वर्ण मुद्राएं और माणिक दिए, वे इस अभागे की दरिद्रता को नहीं मिटा सके। फिर इन कौड़ियों से इस ब्राह्मण का क्या होगा?” भगवान ने मुस्कुराते हुए अर्जुन से कहा कि वह उस ब्राह्मण के पीछे जाएं।
भिक्षा लेकर घर लौटते हुए ब्राह्माण की नजर जाल में तड़पती एक मछली पर पड़ी। उसे उस मछली पर दया आ गई। उन कौड़ियों के बारे में सोचते हुए, उसने मछली को बचाने के लिए मछुआरे से सौदा किया और मछली को कमंडल में रखकर नदी में छोड़ने चला गया। तभी मछली के मुँह से वही माणिक बाहर आया, जिसे उसने पहले घड़े में छुपाया था। माणिक देखकर ब्राह्माण खुशी से चिल्लाने लगा, “मिल गया, मिल गया!” उसी समय ब्राह्माण की पहले वाली मुद्राएं लूटने वाला लुटेरा भी वहां से गुजरा।
लुटेरे ने समझा कि ब्राह्माण उसे पहचान गया है। पकड़े जाने के डर से उसने स्वर्ण मुद्राओं से भरी पोटली ब्राह्माण को लौटाई।
यह सब देखते हुए अर्जुन ने नमन किया और पूछा, “प्रभु, यह कौन सी लीला है?” जो कार्य स्वर्ण मुद्राएं और मूल्यवान माणिक नहीं कर सके, वही आपकी दो कौड़ियां कर दिखाईं। श्री कृष्ण ने उत्तर दिया, “पार्थ! यह केवल सोच का अंतर है। तुम्हारे द्वारा दी गई स्वर्ण मुद्राओं पर ब्राह्मण ने केवल अपने लाभ की कामना की। जबकि मैंने जो दी, उस पर उसने मछली के दुःख का ध्यान रखा।”
जब आप दूसरों के दुःख के बारे में सोचते हैं और उनके भले के लिए कदम बढ़ाते हैं, तब ईश्वर भी आपका साथ देता है।
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