

देहरादून। उत्तराखंड वन विभाग में भारतीय वन सेवा (IFS) के एक वरिष्ठ अधिकारी की एपेक्स स्केल (लेवल-17) में पदोन्नति और हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स (HoFF) पद पर नियुक्ति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि अधिकारी ने वर्षों तक अनिवार्य अचल संपत्ति विवरण (Immovable Property Return-IPR) दाखिल नहीं किया, इसके बावजूद उन्हें पदोन्नति मिल गई।
IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने मुख्य सचिव को कानूनी नोटिस भेजकर यह मामला उठाया है। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि 1993 बैच के उत्तराखंड कैडर अधिकारी रंजन कुमार मिश्रा ने लंबे समय तक IPR दाखिल नहीं किया। केंद्र सरकार के आधिकारिक IPR स्टेटस पोर्टल पर उनके नाम पर 1 जनवरी 2023, 2024, 2025 और 2026 की कोई प्रविष्टि नहीं मिली। दावा किया गया है कि 2017 के बाद से भी ऑनलाइन रिकॉर्ड में कोई IPR दर्ज नहीं है।
नियमों के अनुसार हर अखिल भारतीय सेवा अधिकारी को पिछले साल की अचल संपत्ति और देनदारियों का ब्योरा 31 जनवरी तक दाखिल करना अनिवार्य है। एपेक्स स्केल जैसी ऊंची पदोन्नति के लिए यह शर्त पूरी करना जरूरी माना जाता है। नोटिस में कहा गया है कि पदोन्नति के समय चयन समिति के सामने मिश्रा की IPR स्थिति नहीं रखी गई और इस बारे में कोई जांच-पड़ताल भी नहीं हुई।
रंजन कुमार मिश्रा को 1 दिसंबर 2025 से वेतन मैट्रिक्स के लेवल-17 में पदोन्नत किया गया और उन्हें उत्तराखंड का प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) बनाया गया। चतुर्वेदी ने इस पूरे मामले की स्वतंत्र सीबीआई जांच, पदोन्नति की समीक्षा, संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग की है। साथ ही लंबे समय तक IPR न भरने के कारण घोषित-अघोषित संपत्तियों की जांच भी मांगी गई है।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि कानूनी नोटिस में लगाए गए आरोप सरकारी ऑनलाइन रिकॉर्ड पर आधारित हैं। अंतिम रूप से आईपीआर दाखिल हुआ था या नहीं, इसकी पुष्टि संबंधित विभागीय रिकॉर्ड और जांच से ही हो सकेगी। नोटिस में 30 दिसंबर 2021 की केंद्र सरकार की अधिसूचना जीएसआर 916(ई) का हवाला दिया गया है, जिसके जरिए इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (पे) रूल्स, 2016 में नोट-4 जोड़ा गया था। इसके अनुसार पिछले वर्ष का आईपीआर 31 जनवरी तक दाखिल करना अधिकारी को पे मैट्रिक्स के अगले स्तर पर नियुक्ति के लिए विचार किए जाने की अनिवार्य शर्त है। साथ ही डीओपीटी और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के निर्देशों का भी उल्लेख है, जिनमें आईपीआर ऑनलाइन दाखिल करना जरूरी बताया गया है तथा समय पर न भरने को अनुशासनात्मक कार्रवाई का पर्याप्त आधार माना गया है। इन निर्देशों में देरी की माफी या किसी अन्य रूप में आईपीआर स्वीकार करने का कोई प्रावधान नहीं है।
यह विवाद उत्तराखंड वन विभाग में हाल के प्रशासनिक फैसलों के बीच सामने आया है। इससे पहले भी HOFF पद पर नियुक्ति को लेकर वरिष्ठता और प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठ चुके हैं। फिलहाल सरकार की ओर से इस नोटिस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई है।

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