कैलाश हॉस्पिटल देहरादून ने रचा नया कीर्तिमान, 27 हफ्तों में जन्मे तीन नन्हे फरिश्तों को दी नई जिंदगी

महज एक किलो से भी कम वजन के साथ जन्मे शिशुओं ने डॉक्टरों की टीम की बदौलत जीती जिंदगी की जंग, संस्थान में पहली बार हुआ ट्रिपलेट प्रीमैच्योर बच्चों का सफल उपचार

देहरादून। कैलाश हॉस्पिटल ने नवजात चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यहां गर्भावस्था के महज 27 सप्ताह 4 दिन में जन्मे तीन अत्यंत समयपूर्व शिशुओं का सफल इलाज कर उन्हें पूरी तरह स्वस्थ हालत में परिजनों के साथ घर भेज दिया गया है। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार संस्थान के इतिहास में यह पहला मौका है जब इतने कम समय में जन्मे तीन जुड़वां (ट्रिपलेट) शिशुओं का सफल उपचार कर उन्हें डिस्चार्ज किया गया हो।

तीनों नवजातों का जन्म बेहद कम वजन के साथ हुआ था। एक शिशु का वजन जन्म के समय मात्र 1.03 किलोग्राम, दूसरे का 750 ग्राम और तीसरे का 1.10 किलोग्राम था। जन्म के फौरन बाद उन्हें नवजात गहन चिकित्सा इकाई यानी एनआईसीयू में भर्ती कराया गया, जहां कंसल्टेंट नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. रोहन यादव के नेतृत्व में विशेषज्ञों की एक पूरी टीम उनकी देखभाल में जुट गई।

डॉक्टरों ने अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीकों का सहारा लेते हुए तीनों शिशुओं को एनसीपैप के जरिए सांस लेने में मदद दी और लिसा तकनीक से सर्फेक्टेंट थेरेपी दी, जिससे उनके फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार आया और वेंटिलेटर पर निर्भरता कम हुई। इनमें से एक शिशु की हालत गंभीर रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के कारण नाजुक हो गई थी और उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा। उसे सर्फेक्टेंट की तीन खुराकें दी गईं, जिसके बाद उसकी स्थिति में सुधार आया और उसे सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटा लिया गया।

तीनों बच्चों का इलाज हृदय संबंधी दिक्कत, समयपूर्वता से जुड़ी हड्डियों की कमजोरी सहित अन्य संभावित जटिलताओं के लिए भी किया गया। इस दौरान एक शिशु को लेट-ऑनसेट नियोनेटल सेप्सिस नामक संक्रमण भी हो गया था, जिसे समय पर पहचान कर पूरी तरह ठीक किया गया। सबसे कम वजन वाला शिशु करीब 64 दिनों तक एनआईसीयू में विशेष निगरानी में रहा, जिसके बाद उसे भी स्वस्थ हालत में डिस्चार्ज कर दिया गया।

इलाज के दौरान हर शिशु के चार-चार बार ब्रेन अल्ट्रासाउंड किए गए और राहत की बात यह रही कि सभी रिपोर्ट सामान्य पाई गईं, किसी भी बच्चे में ब्रेन ब्लीड या मस्तिष्क को नुकसान पहुंचने के संकेत नहीं मिले। अस्पताल ने इसे अत्यंत समयपूर्व जन्मे शिशुओं के इलाज में एक बड़ी उपलब्धि करार दिया है।

इससे पहले मां की हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी को भी बड़ी सावधानी से संभाला गया था। इसकी जिम्मेदारी कंसल्टेंट स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. दिव्या गोस्वामी ने निभाई। समय से पहले प्रसव की आशंका को भांपते हुए गर्भावस्था के दौरान ही शिशुओं के फेफड़ों के विकास के लिए एंटीनेटल कॉर्टिकोस्टेरॉयड और मस्तिष्क की सुरक्षा के लिए मैग्नीशियम सल्फेट जैसी जरूरी दवाएं समय रहते दी गई थीं।

डॉ. रोहन यादव ने कहा कि 27 सप्ताह में जन्मे तीनों शिशुओं का सफल इलाज और स्वस्थ होकर घर लौटना पूरी टीम के लिए गर्व की बात है। उन्होंने इस उपलब्धि का श्रेय आधुनिक नवजात चिकित्सा तकनीक, समय पर इलाज, विशेषज्ञों की टीमवर्क और माता-पिता के भरोसे को दिया। अस्पताल प्रबंधन ने इसे संस्थान के लिए एक बड़ा मील का पत्थर बताते हुए कहा कि यह सफलता समयपूर्व जन्म जैसी चुनौतियों से जूझ रहे तमाम परिवारों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है।

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