हममें से बहुत से लोगों को लगता है कि परमात्मा हमें भूल गए हैं या उन्होंने हमें छोड़ दिया है। हम अपने जीवन में परमात्मा की मौजूदगी को महसूस नहीं करते। संत-महापुरुष हमें समझाते हैं कि हम सब खुशकिस्मत हैं क्योंकि हमारी आत्मा परमात्मा का अंश है। हममें से प्रत्येक को परमात्मा-प्राप्ति का एक सुनहरा अवसर दिया गया है। हममें से बहुत से लोग अपने धर्म-स्थानों पर जाते हैं। यह परमात्मा से जुड़ने की शुरुआत है। हमारे बाहरी धार्मिक कार्य हमें परमात्मा को याद करने, उनकी पूजा-स्तुति करने का समय देते हैं। ये सभी हमारा ध्यान परमात्मा की ओर करते हैं।यह सब ठीक है, मगर आत्मा को सीधे परमात्मा का अनुभव कराने के लिए इन बाहरी कार्यों से कुछ और अधिक करने की आवश्यकता है। जब हम अपने अंदर परमात्मा को पाने की जरूरत महसूस करते हैं, और उस दिव्य चिंगारी का प्रत्यक्ष अनुभव पाने के लिए उत्सुक हो जाते हैं, तब हम परमात्मा की खोज शुरू कर देते हैं। परमात्मा अति दयालु हैं। वह हम पर इतनी मेहर करते हैं कि हम किसी न किसी आध्यात्मिक गुरु के चरण-कमलों में पहुंच जाते हैं। परमपिता-परमेश्वर और एक पूर्ण गुरु में कोई भी फर्क नहीं होता। वह हमें परमात्मा के घर वापस जाने का रास्ता दिखाते हैं।
आध्यात्मिक सत्गुरु का मिलना एक बहुत बड़ी खुशकिस्मती है। सत्गुरु मिलने के हमें कई फायदे होते हैं। पहला, सत्गुरु हमें नामदान देते हैं ताकि हम प्रभु की ज्योति और श्रुति का अनुभव कर सकें। सत्गुरु आंतरिक रूहानी मंडलों में हमारी आत्मा के मार्गदर्शक होते हैं। हमारी परेशानियों में मदद करने के लिए सत्गुरु एक मित्र की तरह होते हैं। वह हमें रोजाना ध्यान-अभ्यास करना, नैतिक जीवन जीना, निष्काम सेवा करना, परमात्मा से प्रेम, पूरी सृष्टि से प्रेम और सत्संग सुनने के लिए प्रेरित करते हैं।
जब हम आध्यात्मिक रास्ते पर तरक्की करते हैं तो हमें यह अनुभव हो जाता है कि जीवन मात्र शारीरिक सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक है। जीवन के कई पहलू हैं जिनके लिए हमें शुक्रगुजार होना चाहिए। परमात्मा लगातार हमें वापस बुलाने की उम्मीद से संदेश भेजते रहते हैं। परमात्मा संतों को भेजते हैं ताकि वे मानव जाति को वापस अपने सच्चे घर जाने के लिए जागरूक करें। कुछ लोग अपनी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक जरूरतों को पूरा करने में ही व्यस्त रहते हैं तो कुछ जीवन और मृत्यु के रहस्य पर प्रश्न उठाते हैं। जब उनमें उत्तर पाने की सच्ची चाह पैदा होती है, तभी परमात्मा मार्गदर्शन करते हैं।
हमारी आत्मा रूहानी खजाने से भरपूर है। हमारे अंदर आंतरिक ज्योति और श्रुति की ऐसी किरणें आती हैं जो हमें इतनी खुशी से भर देती हैं, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। परमात्मा की तरफ कृतज्ञता प्रकट करने का पहला तरीका है कि हम ध्यान-अभ्यास द्वारा इस ज्योति और श्रुति की सौगात को अनुभव करें। दूसरा तरीका है हम इस दिव्य प्रेम की चिंगारी को औरों के साथ भी बांटें। हम अपने दिल से नफरत, पक्षपात और कट्टरता को निकाल दें।
कृतज्ञता व्यक्त करने का तीसरा तरीका है, उस ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना। जब हम कुछ कविता बनाते हैं तो हम सोचते हैं कि हम कितने महान हैं। हम यह भूल जाते हैं कि जिसने यह खूबसूरत सृष्टि बनाई है वो कितना महान होगा। यदि हम कृतज्ञता और नम्रता धारण कर लें, तब हम परमात्मा का हर क्षण, हर सांस में धन्यवाद कर सकेंगे।
लेखक : संत राजेंद्र सिंह जी महाराज।
(सावम कृपाल रुहानी मिशन, जिसे भारत के बाहर साइंस आफ़ स्पिरिच्युएलिटी के नाम से भी जाना जाता है, के अध्यक्ष संत राजिन्दर जी महाराज धर्म और विज्ञान, दोनों के ही बड़े जानकार हैं। संत कृपाल सिंह जी महाराज और संत दर्शन सिंह जी महाराज, इनके आध्यात्मिक गुरु रहे हैं।)
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