
एसएचए की छापेमारी में योजना से जुड़े पांच अस्पतालों की बदइंतजामी बेपर्दा,
देहरादून। आयुष्मान भारत योजना के तहत संबद्ध निजी अस्पतालों की हकीकत मंगलवार को राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण की एक औचक छापेमार कार्रवाई में सामने आ गई। प्राधिकरण अध्यक्ष अरविंद सिंह ह्यांकी के निर्देश पर निदेशक क्लेम डा. सरोज नैथानी की अगुआई वाली टीम ने पावरलाइफ, प्रेमसुख, प्रकाशदीप, वेलमेड और सुनंदा मेडिकल सेंटर में बिना पूर्व सूचना दबिश दी, तो वहां गड़बड़ियों का अंबार मिला। मरीजों से मनमानी वसूली, बिना जरूरत आइसीयू में भर्ती रखने की प्रवृत्ति, डाक्टरों की अनुपस्थिति, डायलिसिस सेवाओं में लापरवाही और सुरक्षा मानकों की खुली अनदेखी जैसी अनियमितताएं पकड़ में आईं। नतीजतन प्राधिकरण ने प्रकाशदीप, पावरलाइफ अस्पताल और सुनंदा मेडिकल सेंटर की डायलिसिस यूनिट की योजना से संबद्धता निलंबित करने की संस्तुति कर दी, जबकि प्रेमसुख और सुनंदा अस्पताल पर आर्थिक दंड थोपने की सिफारिश की गई है। सभी पांच अस्पतालों को कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया है।
सबसे चिंताजनक स्थिति पावरलाइफ अस्पताल में देखने को मिली, जहां टीम को सामान्य वार्ड का अता-पता ही नहीं मिला। इसके बजाय छह बेड का एचडीयू और आठ बेड का आइसीयू ही चलता पाया गया, यानी मरीजों को सीधे महंगी और गंभीर श्रेणी की चिकित्सा में धकेला जा रहा था। जांच में खुलासा हुआ कि घबराहट और उल्टी जैसी मामूली शिकायत लेकर आए एक मरीज को भी अनावश्यक रूप से आइसीयू में भर्ती कर दिया गया था। अस्पताल में टोल फ्री नंबर और जनजागरूकता सामग्री तक प्रदर्शित नहीं थी, आइसीयू की चार्टिंग अपडेट नहीं मिली और बायोमेडिकल वेस्ट की लाग बुक पिछले तीन महीने से खाली पड़ी मिली।
प्रेमसुख अस्पताल में एक आयुष्मान लाभार्थी से 48 हजार रुपये के अलावा अन्य मदों में छह हजार रुपये अलग से वसूलने की शिकायत मिली। योजना के प्री-आथराइजेशन में देरी, रैंप की गैरमौजूदगी और कमजोर अग्नि सुरक्षा व्यवस्था जैसी खामियां भी पकड़ में आईं। सूचना बोर्ड, टोल फ्री नंबर और जनजागरूकता सामग्री यहां भी नदारद थी। हैरानी की बात यह रही कि आपरेशन थिएटर की प्रभारी नर्स की जिम्मेदारी एक ओटी तकनीशियन के कंधों पर डाली गई थी, और स्टाफ को मरीजों की भर्ती प्रक्रिया तक की ठीक जानकारी नहीं थी।
इन सबसे ज्यादा संगीन हालात प्रकाशदीप अस्पताल के निकले, जहां मरीजों से 85 हजार रुपये तक वसूले जाने की शिकायत मिली। यहां का आइसीयू बेहद जर्जर हालत में मिला, जिसके बाद दो गंभीर मरीजों को तत्काल इंदिरेश अस्पताल रेफर करना पड़ा। निरीक्षण के वक्त एक भी उपचाररत चिकित्सक मौजूद नहीं था। मरीजों ने टीम को बताया कि पिछले दस दिनों से अस्पताल में नियमित डाक्टर ही नहीं आ रहे और इलाज पूरी तरह नर्सिंग स्टाफ के सहारे चल रहा है। पूरे अस्पताल में महज एक एंबुलेंस उपलब्ध मिली।
सुनंदा मेडिकल सेंटर की डायलिसिस यूनिट की पड़ताल में भी हालात बेहद खराब निकले। वेंटिलेशन, रैंप और अग्नि निकास मार्ग जैसी बुनियादी सुविधाएं सिरे से गायब थीं। डायलिसिस करा रहे मरीजों के स्वास्थ्य रिकार्ड तक संधारित नहीं किए गए थे, टोल फ्री नंबर और जनजागरूकता सामग्री का अभाव था, और डायलिसिस में इस्तेमाल होने वाला आरओ सिस्टम भी तय मानकों पर खरा नहीं उतरा। तीमारदारों के बैठने या विश्राम की कोई व्यवस्था भी नहीं मिली।
वेलमेड अस्पताल में भी जांच टीम को रैंप और जनजागरूकता सामग्री नदारद मिली। चौंकाने वाली बात यह रही कि 140 बेड की क्षमता वाले इस अस्पताल में सौ मरीज भर्ती होने के बावजूद आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के सिर्फ छह और राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजना के मात्र सात मरीज ही मिले। अस्पताल में केवल एक आरओ प्लांट संचालित मिला, बायोमेडिकल वेस्ट की लाग बुक का रखरखाव संतोषजनक नहीं था और आपरेशन थिएटर की कल्चर रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं कराई जा सकी।

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