महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान शिव की आराधना, व्रत और जागरण के लिए समर्पित है। यह फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। **2026 में महाशिवरात्रि 15 फरवरी (रविवार) को मनाई जाएगी**। चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी शाम 5:04 बजे से शुरू होकर 16 फरवरी शाम 5:34 बजे तक रहेगी। निशीथ काल (मध्यरात्रि) में तिथि व्याप्त होने के कारण व्रत और पूजन 15 फरवरी को ही किया जाएगा। निशीथ काल पूजा का समय लगभग रात 12:09 से 1:01 बजे तक (16 फरवरी की सुबह) रहेगा।
यह पर्व शिव भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस दिन शिव-पार्वती विवाह की स्मृति भी जुड़ी है और ज्योतिर्लिंगों के दर्शन से विशेष फल मिलता है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से **दूसरा ज्योतिर्लिंग** है **मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग**, जो आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम (नल्लामाला पहाड़ियों पर, कृष्णा नदी के तट) स्थित है। इसे “दक्षिण का कैलाश” भी कहा जाता है। यहां भगवान शिव **मल्लिकार्जुन स्वामी** के रूप में और माता पार्वती **भ्रमारांबा देवी** के रूप में विराजमान हैं। यह स्थान ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ 18 महाशक्तिपीठों में से एक भी है, जहां शिव और शक्ति दोनों की पूजा होती है। मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कहानी
शिव पुराण और स्कंद पुराण में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा विस्तार से वर्णित है। यह कथा भगवान शिव के परिवारिक प्रेम, पुत्र वात्सल्य और माता-पिता के त्याग से जुड़ी है।
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कहानी
शिव पुराण और स्कंद पुराण में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा विस्तार से वर्णित है। यह कथा भगवान शिव के परिवारिक प्रेम, पुत्र वात्सल्य और माता-पिता के त्याग से जुड़ी है।
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के दोनों पुत्रों—**भगवान गणेश** और **भगवान कार्तिकेय**—में विवाद हो गया कि दोनों में से पहले किसका विवाह होगा। दोनों खुद को बड़ा मानते थे। विवाद सुलझाने के लिए माता पार्वती और भगवान शिव ने शर्त रखी: “जो सबसे पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौट आएगा, वही बड़ा माना जाएगा और पहले उसका विवाह होगा।”
कार्तिकेय अपने मोर वाहन पर सवार होकर तुरंत पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल पड़े। वहीं गणेश जी ने बुद्धि का सहारा लिया। उन्होंने माता-पिता (शिव-पार्वती) की परिक्रमा की और कहा, “आप ही मेरी पूरी दुनिया हैं। आपकी परिक्रमा से मुझे पृथ्वी की परिक्रमा का फल मिल गया।” इस प्रकार गणेश जी को पहले विवाह का अधिकार मिला।
इस फैसले से कार्तिकेय बहुत क्रोधित और दुखी हो गए। वे क्रोंच पर्वत (श्रीशैल पर्वत) की ओर चले गए और वहां तपस्या करने लगे, परिवार से दूर होकर।
पुत्र के वियोग से माता पार्वती और भगवान शिव बहुत व्यथित हुए। दोनों पुत्र को मनाने श्रीशैल पर्वत पहुंचे। लेकिन कार्तिकेय दूर चले गए। पुत्र की लालसा में भगवान शिव ने स्वयं को **ज्योतिर्लिंग** के रूप में प्रकट किया। माता पार्वती भी उनके साथ विराजमान हुईं। इस ज्योतिर्लिंग का नाम **मल्लिकार्जुन** पड़ा, जहां “मल्लिका” का अर्थ माता पार्वती (जैसे मल्लिका पुष्प) और “अर्जुन” का अर्थ भगवान शिव है। यह नाम शिव-पार्वती के संयुक्त रूप और उनके प्रेम का प्रतीक है।
इस कथा से यह ज्योतिर्लिंग परिवारिक एकता, माता-पिता के प्रेम और पुत्र के प्रति वात्सल्य का प्रतीक बन गया। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से दर्शन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, पाप नष्ट होते हैं, धन-समृद्धि मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का महत्व और विशेष बातें
– यह 12 ज्योतिर्लिंगों में दूसरा स्थान रखता है (सोमनाथ के बाद)।
– यहां हर महीने शिव-पार्वती का मिलन माना जाता है।
– महाशिवरात्रि पर यहां लाखों श्रद्धालु आते हैं। भव्य अभिषेक, रुद्राभिषेक, जागरण और विशेष पूजा होती है।
– मंदिर द्रविड़ शैली में बना है और प्राचीन इतिहास रखता है।
**महाशिवरात्रि 2026 पर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के दर्शन का विशेष महत्व** रहेगा। यदि संभव हो तो इस पवित्र तीर्थ पर जाकर शिवजी की आराधना करें। अन्यथा घर पर ही बिल्वपत्र, दूध, शहद से अभिषेक करें और “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें।
हर हर महादेव! ॐ नमः शिवायः
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