रामपुर तिराहा कांड: 32 साल बाद मिला इंसाफ, फर्जी हथियार बरामदगी में तीन पूर्व पुलिसकर्मी दोषी करार

CBI कोर्ट ने सुनाई डेढ़-डेढ़ साल की सजा, राज्य आंदोलनकारियों के परिजनों ने बताया न्याय की ऐतिहासिक जीत

देहरादून/मुजफ्फरनगर। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान हुए बहुचर्चित रामपुर तिराहा गोलीकांड से जुड़े फर्जी हथियार बरामदगी मामले में तीन दशक से अधिक समय बाद अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है। मुजफ्फरनगर की विशेष सीबीआई अदालत ने इस मामले में तीन पूर्व पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए डेढ़-डेढ़ वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। दोषियों में तत्कालीन छपार थाना प्रभारी बृजकिशोर तथा कांस्टेबल उमेश चंद व अनिल कुमार शामिल हैं। अदालत ने तीनों पर 21-21 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।

विशेष सीबीआई अदालत के पीठासीन अधिकारी डीके फौजदार ने दोनों पक्षों की गवाहियों और दस्तावेजी साक्ष्यों की विस्तृत सुनवाई के बाद यह निर्णय सुनाया। इस मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता अनुराग वर्मा ने इस फैसले को राज्य आंदोलनकारियों के लिए न्याय की लंबी लड़ाई में एक बड़ा मुकाम बताया।

गौरतलब है कि वर्ष 1994 में पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली कूच कर रहे आंदोलनकारियों पर मुजफ्फरनगर स्थित रामपुर तिराहे पर पुलिस ने गोलियां बरसाई थीं, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे। घटना के बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए आंदोलनकारियों के खिलाफ अवैध हथियार, कारतूस और धारदार हथियार बरामद करने का दावा करते हुए मामला दर्ज किया था। पुलिस की ओर से यह भी कहा गया था कि आंदोलनकारियों ने पहले फायरिंग की, जिसके बाद पुलिस को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी।

बाद में जांच सीबीआई को सौंपे जाने पर पूरा मामला ही संदिग्ध निकला। जांच में सामने आया कि हथियारों की बरामदगी सिरे से फर्जी थी और जब्ती मेमो बनाने के लिए कई गवाहों से कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करा लिए गए थे, जिनका इस्तेमाल बाद में आंदोलनकारियों को दोषी ठहराने के लिए किया गया। इन तथ्यों के आधार पर सीबीआई ने बृजकिशोर, उमेश चंद और अनिल कुमार के विरुद्ध फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश की धाराओं में आरोप पत्र दाखिल किया था।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से माना कि पुलिसकर्मियों ने झूठे साक्ष्य गढ़कर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और निर्दोष आंदोलनकारियों को अपराधी साबित करने की कोशिश की। तीन दशक से अधिक समय तक चली इस कानूनी लड़ाई का फैसला उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जा रहा है।

इस फैसले पर आंदोलनकारियों के परिजनों और राज्य आंदोलन समर्थकों ने खुशी जताते हुए इसे इंसाफ की बड़ी जीत करार दिया है। घटना के चश्मदीद और सीबीआई गवाह रहे महावीर शर्मा के पुत्र पप्पू शर्मा ने कहा कि अदालत का यह फैसला राज्य आंदोलनकारियों की बड़ी नैतिक जीत है और देर से ही सही, न्याय मिलने का भरोसा एक बार फिर मजबूत हुआ है।

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