एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय में भारतीय भाषाओं की समरसता पर रिफ्रेशर कोर्स शुरू, देशभर के शिक्षकों ने लिया हिस्सा

यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र में 20 जुलाई से 1 अगस्त तक चलेगा दो सप्ताह का कार्यक्रम, भाषाविदों ने रखे विचार

श्रीनगर गढ़वाल । हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र (एमएमटीटीसी) में “भारतीय भाषाओं की समरसता एवं बहुलता का स्वरूप” विषय पर आयोजित ऑनलाइन रिफ्रेशर कोर्स का सोमवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। यह कोर्स 20 जुलाई से 1 अगस्त 2026 तक चलेगा, जिसमें देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से बड़ी संख्या में शिक्षक प्रतिभाग कर रहे हैं।

उद्घाटन सत्र में कार्यक्रम संयोजक प्रो. गुड्डी बिष्ट पंवार ने कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह के मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त किया। मुख्य अतिथि भाषाविद् प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि भारत में एक ही भाषा-परिवार का भाव निहित है और सभी भाषाएं एक मूल स्रोत से विकसित हुई हैं। उन्होंने कहा कि समय, स्थान और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार भाषाओं के रूप भले बदले हों, लेकिन उनका तात्त्विक अभेद आज भी बना हुआ है। उन्होंने भारतीय भाषाओं के अध्ययन को भारतीय ज्ञान-परंपरा और राष्ट्रीय चेतना को समझने का माध्यम बताया।

विशिष्ट अतिथि दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य प्रो. अनिल रॉय ने भाषाई विविधता को आधुनिक भारत की सबसे बड़ी पहचान बताया। उनके अनुसार शब्दावली और अभिव्यक्ति में भिन्नता होने के बावजूद भारतीय भाषाओं की सांस्कृतिक चेतना समान है, और सभी बोलियां हिंदी को समृद्ध करने का काम कर रही हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डीन प्रो. एम. एस. पंवार ने कहा कि भारत की पर्वतीय भौगोलिक संरचना और जनजातीय समुदायों ने भाषाओं के संरक्षण में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने प्रतिभागियों से भाषा संवर्धन में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

इस मौके पर एमएमटीटीसी निदेशक प्रो. डी. एस. नेगी, डॉ. राहुल कुंवर, डॉ. सोमेश थपलियाल और डॉ. कविता भट्ट सहित कई विद्वान मौजूद रहे। द्वितीय सत्र में प्रो. अनिल रॉय ने “भाषीय संरचना एवं भाषाओं की परिवर्तनशीलता” पर व्याख्यान दिया और कहा कि हिंदुस्तान को समझने के लिए हिंदी को समझना जरूरी है। तृतीय सत्र में डॉ. सुशील कोटाला ने संस्कृति के संरक्षण में भारतीय भाषाओं के योगदान पर विचार रखे, जबकि चतुर्थ सत्र में डॉ. सुशील कोटनाला ने भाषाई समरसता विषय पर व्याख्यान दिया। कार्यक्रम का समापन प्रो. गुड्डी बिष्ट पंवार के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

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