MSP पर खरीदे धान से सस्ता चावल, एथेनॉल कंपनियों को बिक्री: खाद्य सुरक्षा से कैसे जुड़ा है पूरा खेल?

युद्धजीत शंकर दास, इंडिया टुडे
भारत के एथेनॉल-ब्लेंडिंग कार्यक्रम की कई परतों में से एक विडंबना यह भी है. सरकार की ऊर्जा सुरक्षा की कोशिश उसके खाद्य सुरक्षा तंत्र से इस तरह जुड़ी हुई है, मानो उसमें परजीवी की तरह पकड़ बनाने वाले कांटे लगे हों. सरकार जिस धान को करदाताओं के पैसे से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदकर गरीबों में बांटती है, उसी धान से तैयार चावल डिस्टिलरी कंपनियों को आधी कीमत पर बेचा जा रहा है. यह स्थिति इसलिए भी हैरान करने वाली है क्योंकि अंतिम उत्पाद यानी चावल, जिसकी ढुलाई, मिलिंग और भंडारण पर अतिरिक्त खर्च भी होता है, उसे उस कच्चे उत्पाद यानी धान की खरीद कीमत से भी कम दाम पर बेचा जा रहा है. यानी जिस धान को सरकार ने MSP पर खरीदा, उसी से बना चावल सरकार उससे भी कम कीमत पर एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को दे रही है. अब सवाल यह है कि आखिर यह पूरा खेल कैसे चल रहा है और इसमें नेशनल फूड सिक्योरिटी प्रोग्राम यानी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम का जिक्र क्यों हो रहा है. साथ ही, यह समझना भी जरूरी है कि सरकार ऐसा क्यों कर रही है. सरकार का कहना है कि नेशनल एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम का मकसद पेट्रोलियम के आयात पर निर्भरता कम करना और देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचाना है. पहली नजर में यह तर्क सही भी लगता है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का करीब 90 फीसदी हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में पेट्रोल में एथेनॉल की ब्लेंडिंग बढ़ाकर तेल आयात का खर्च कम करना एक अहम कदम माना जा सकता है.
लेकिन इस पूरी योजना के सामने एक बड़ी समस्या भी है. मौजूदा आर्थिक परिस्थितियां इस मॉडल के पक्ष में पूरी तरह नजर नहीं आतीं. यहीं से एथेनॉल उत्पादन, सरकारी खाद्यान्न भंडार और खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के बीच संबंध को समझना जरूरी हो जाता है. यही आर्थिक वजह है कि सरकार एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को भारतीय खाद्य निगम यानी FCI के गोदामों में रखे ‘अतिरिक्त’ चावल की सप्लाई कर रही है. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 31 जुलाई को जारी एक बयान में कहा कि एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल यानी EBP कार्यक्रम का देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ा है. हालांकि, मंत्रालय के इस स्पष्टीकरण के बावजूद कुछ अहम सवालों का जवाब स्पष्ट नहीं हुआ. सबसे बड़ा सवाल यही है कि करदाताओं के पैसे से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के तहत खरीदे गए चावल को एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को सब्सिडी वाली दरों पर आखिर क्यों दिया जा रहा है. सवाल यह भी है कि खाद्य सुरक्षा के लिए जुटाए गए अनाज का इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन के लिए करने की आर्थिक और नीतिगत वजह क्या है. लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और एग्रीकल्चर एक्सपर्ट सुधीर पंवार ने इंडिया टुडे डिजिटल से बातचीत में कहा, “ऐसे देश में जहां करीब 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन पर निर्भर हैं, वहां खाद्य अनाज का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने के लिए करना एक बड़ा त्याग है. भारत जैसे देश में भोजन को ऊर्जा के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.”
पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन एथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल के जरिए इस लक्ष्य को हासिल करने की जल्दबाजी पर सवाल उठ रहे हैं. सरकार ने पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाकर E20 पेट्रोल की बिक्री अनिवार्य कर दी है. पहले इस लक्ष्य को 2030 तक हासिल करने की समय सीमा तय की गई थी, लेकिन पेट्रोल में मिलाने के लिए जरूरी एथेनॉल उत्पादन क्षमता भारत ने 2025 तक ही हासिल कर ली. यानी तय समय सीमा से करीब पांच साल पहले ही देश इस क्षमता तक पहुंच गया. हालांकि, उस समय सड़क पर चलने वाली करीब 80 फीसदी गाड़ियां E20 ईंधन के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं थीं. इसी वजह से E20 को लेकर इसके असर और पुराने वाहनों के इस्तेमाल पर बहस भी तेज हुई. 17 अगस्त को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने सुझाव दिया कि पुरानी गाड़ियों के लिए E10 पेट्रोल उपलब्ध रखा जाना चाहिए.

नागेश्वरन ने यह लेख डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स के कंसल्टेंट आकाश पुजारी के साथ मिलकर लिखा था. इसमें यह भी कहा गया कि भारत को E20 से आगे बढ़ने से पहले “खाने बनाम ईंधन के ट्रेड-ऑफ की लागत” का बेहतर तरीके से आकलन करना चाहिए. दरअसल, सरकार E25 और उससे ज्यादा एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन की दिशा में भी आगे बढ़ रही थी, लेकिन इसका विरोध होने के बाद फिलहाल इस दिशा में कदम रोक दिए गए. CEA नागेश्वरन ने भी ज्यादा एथेनॉल वाले मिश्रण की ओर तेजी से बढ़ने को लेकर सावधानी बरतने की बात कही है. उनका तर्क है कि खेती के पैटर्न में बदलाव और एथेनॉल उत्पादन के लिए तैयार की जा रही डिस्टिलरी क्षमता से जुड़े फैसले बाद में आसानी से बदले नहीं जा सकते. ऐसे में आगे की नीति तय करते समय इसके आर्थिक और खाद्य सुरक्षा से जुड़े असर का पहले से आकलन करना जरूरी है. सरकार पर एथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल यानी EBP कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का एक बड़ा दबाव यह भी है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए देश में पहले ही बड़ी संख्या में प्लांट लगाए जा चुके हैं. इन प्लांट्स की स्थापना में भारी निवेश हुआ है और इसके लिए बैंकों से बड़ी रकम के कर्ज भी लिए गए हैं. अब इन कर्जों की अदायगी का समय नजदीक आ रहा है. ऐसे में निवेशकों और बैंकों के लिए एथेनॉल की ब्लेंडिंग को धीरे-धीरे बढ़ाए जाने का इंतजार करना आसान नहीं हो सकता. यही वजह है कि सरकार पर एथेनॉल की खपत बढ़ाने और EBP कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाने का दबाव माना जा रहा है.

भारत की एथेनॉल उत्पादन क्षमता में पिछले एक दशक में तेज बढ़ोतरी हुई है. 2014 में देश की कुल एथेनॉल उत्पादन क्षमता करीब 421 करोड़ लीटर थी, जो 2026 तक बढ़कर लगभग 2,000 करोड़ लीटर हो गई. क्षमता में इस तेज विस्तार का नतीजा यह है कि भारत के पास अब करीब 700 करोड़ लीटर की अतिरिक्त एथेनॉल उत्पादन क्षमता मौजूद है. इसका सीधा मतलब है कि देश मौजूदा जरूरत से ज्यादा एथेनॉल का उत्पादन करने की स्थिति में है. इसलिए इस अतिरिक्त क्षमता का इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए एथेनॉल की मांग और पेट्रोल में इसकी ब्लेंडिंग बढ़ाना सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है. ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) की ओर से इंडिया टुडे डिजिटल के साथ साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, देश में फिलहाल करीब 370 डिस्टिलरी काम कर रही हैं, जबकि 40 और डिस्टिलरी निर्माणाधीन हैं. एथेनॉल एक बायोफ्यूल है, यानी इसके उत्पादन के लिए कृषि आधारित कच्चे माल यानी फीडस्टॉक की जरूरत होती है. डिस्टिलरी की क्षमता बढ़ाने की गुंजाइश काफी ज्यादा है, लेकिन इसके लिए जरूरी फीडस्टॉक की लगातार और पर्याप्त सप्लाई सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती है. चूंकि यह कच्चा माल कृषि से आता है, इसलिए इसकी उपलब्धता सीमित है और इसकी कीमत भी उत्पादन की लागत पर सीधा असर डालती है.

भारत में एथेनॉल उत्पादन के लिए पहले मुख्य रूप से शीरा यानी मोलासेस और खराब या टूटे हुए चावल का इस्तेमाल किया जाता था. अब इस दायरे में मक्का जैसे अनाज और चावल भी बड़े पैमाने पर शामिल हो गए हैं. मौजूदा ट्रेंड के मुताबिक, भारत में एथेनॉल की कुल सप्लाई में करीब 67 फीसदी हिस्सा अनाज आधारित फीडस्टॉक से आता है, जबकि बाकी हिस्सा गन्ने से जुड़े फीडस्टॉक से पूरा होता है. AIDA के मुताबिक, यह आंकड़ा एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को बनाए रखने में अनाज की बढ़ती और रणनीतिक भूमिका को दिखाता है. AIDA के प्रेसिडेंट विजेंद्र सिंह ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि सरकार ने एथेनॉल उत्पादकों के लिए यह व्यवस्था की है कि उनके फीडस्टॉक का कम से कम 40 फीसदी हिस्सा भारतीय खाद्य निगम यानी FCI के पास मौजूद अतिरिक्त चावल के स्टॉक से लिया जाए. सिंह के मुताबिक, डिस्टिलर्स मक्का और गन्ने जैसे अन्य फीडस्टॉक की खरीद खुद करते हैं, जबकि टूटे हुए या अतिरिक्त चावल की सप्लाई सरकार की ओर से की जाती है. इससे एथेनॉल उत्पादन में सरकारी खाद्यान्न भंडार की भूमिका भी बढ़ गई है. विजेंद्र सिंह ने बताया कि FCI के गोदामों में चावल का बहुत बड़ा स्टॉक बचा हुआ है, जिसमें टूटा हुआ चावल भी शामिल है, जो इंसानों के खाने लायक नहीं है. सरकार के पास इसे ठिकाने लगाने के सीमित रास्ते हैं, और इसीलिए उसने यह नियम बनाया है कि इथेनॉल का 40% उत्पादन FCI के बचे हुए चावल से ही होना चाहिए. लेकिन जानकारों का कहना है कि टूटा हुआ चावल खाने के लिए बिल्कुल ठीक है. साथ ही, यह भी याद रखें कि डिस्टिलरी को जो टूटा हुआ चावल दिया जा रहा है, उसे सरकार ने FCI के ज़रिए भारत के ‘नेशनल फ़ूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन मिशन’ के तहत खरीदा था.
भारत के इतिहास में अकाल की ऐसी यादें दर्ज हैं जिनमें लाखों लोगों की जान गई थी. आज़ाद भारत को विरासत में अनाज की कमी मिली थी और देश को गुज़ारे के लिए विदेशी मदद पर निर्भर रहना पड़ता था. पश्चिमी देशों से मिलने वाली मदद में अक्सर खराब गेहूं शामिल होता था. 1960 के दशक में भारत ने वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में हरित क्रांति की शुरुआत की. इसका सबसे बड़ा असर गेहूं और धान के उत्पादन पर पड़ा. खासतौर पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अनाज का उत्पादन तेजी से बढ़ा और धीरे-धीरे भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनने लगा. सरकार ने धान और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों की सरकारी खरीद बढ़ाई और भारतीय खाद्य निगम यानी FCI के गोदामों में बफर स्टॉक तैयार किया, ताकि जरूरत के समय देश में अनाज की कमी न हो. अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने 2007-08 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन यानी NFSM की शुरुआत की. इसका मकसद चावल, गेहूं और दालों का उत्पादन बढ़ाना था. बाद में 2014-15 में इसका नाम बदलकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और पोषण मिशन यानी NFSNM कर दिया गया. इसके बाद सितंबर 2013 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम यानी NFSA लागू किया. यह एक महत्वपूर्ण कानून था, जिसका उद्देश्य देश के लोगों के लिए खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना था.

सरल शब्दों में देखें तो भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के दो बड़े हिस्से हैं. पहला, किसानों से अनाज का उत्पादन और सरकारी खरीद, और दूसरा, जरूरतमंद लोगों तक उसी अनाज का वितरण. सरकार धान और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP के तहत करती है. इसके बाद इस अनाज को राशन की दुकानों और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए लोगों तक पहुंचाया जाता है. मौजूदा व्यवस्था के तहत 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त खाद्यान्न दिया जा रहा है. पात्र लाभार्थियों को हर महीने प्रति व्यक्ति 5 किलो अनाज मिलता है, जिसमें बड़ी हिस्सेदारी चावल की होती है. अब सवाल यह है कि खाद्य सुरक्षा के लिए सरकारी व्यवस्था में खरीदे गए चावल का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में कैसे होने लगा. सिर्फ खरीफ मार्केटिंग सीजन 2024-25 में सरकार ने धान की खरीद पर करीब 65,695 करोड़ रुपये खर्च किए. यानी किसानों से धान खरीदने में टैक्सपेयर्स के पैसे का बड़ा हिस्सा लगा. इसके बाद इसी सरकारी खरीद व्यवस्था से जुड़े चावल को इथेनॉल बनाने वाली डिस्टिलरी को अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराया गया. उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 28 जुलाई को राज्यसभा में दिए एक जवाब में इस कीमत का विवरण साझा किया.

आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में FCI को धान की खरीद, भंडारण, परिवहन और दूसरी लॉजिस्टिक लागत मिलाकर करीब 3,889 रुपये प्रति क्विंटल यानी 38.89 रुपये प्रति किलो की लागत पड़ी. कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी जैसे विशेषज्ञों का अनुमान है कि वास्तविक लागत इससे भी ज्यादा, करीब 44 रुपये प्रति किलो हो सकती है. इसके मुकाबले एथेनॉल बनाने वाली डिस्टिलरी को चावल औसतन 2,320 रुपये प्रति क्विंटल यानी 23.20 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया गया. यानी सरकारी लागत और बिक्री कीमत के बीच करीब 1,600 रुपये प्रति क्विंटल या लगभग 16 रुपये प्रति किलो का अंतर रहा. सरकार का तर्क है कि डिस्टिलरी को दिया जाने वाला यह चावल टूटा हुआ या खराब गुणवत्ता का है और इंसानी उपभोग के लिए उपयुक्त नहीं है. हालांकि, इसी दावे को लेकर विशेषज्ञों के बीच बहस है. सवाल यह उठता है कि अगर यह चावल सरकारी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के तहत खरीदा गया था, तो इसे इथेनॉल उत्पादन के लिए इतनी कम कीमत पर देने का आर्थिक और नीतिगत औचित्य क्या है.

एग्रीकल्चर एक्सपर्ट सुधीर पंवार का कहना है कि चावल के टूटे हुए होने का मतलब यह नहीं है कि वह खाने लायक नहीं रह जाता. उन्होंने समझाया, “टूटे चावल में पोषक तत्व वही रहते हैं. फर्क सिर्फ इतना होता है कि उसका आकार और रूप बदल जाता है.” पंवार के मुताबिक, टूटे चावल का इस्तेमाल लंबे समय से पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम यानी PDS में किया जाता रहा है. उनका कहना है कि सरकारी खाद्य व्यवस्था में अनाज को बर्बाद नहीं किया जाता था. बचा हुआ टूटे चावल का स्टॉक जरूरत के मुताबिक मानवीय सहायता के तौर पर अफ्रीकी देशों को भी भेजा जाता रहा है. उनका यह भी कहना है कि भारत में एथेनॉल उत्पादन के लिए अनाज के इस्तेमाल में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. ऐसे में सिर्फ खाद्यान्न की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि पानी की खपत, खेती योग्य जमीन के इस्तेमाल और इसके दूसरे पर्यावरणीय असर पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. पंवार के मुताबिक, टूटे चावल को इंसानी उपभोग के लिए अनुपयुक्त बताने का तर्क एथेनॉल-ब्लेंडिंग मॉडल के पक्ष में इस्तेमाल किया जा रहा हो सकता है. हालांकि, इस मुद्दे पर अलग-अलग पक्षों के अलग-अलग तर्क हैं.
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, FCI के अतिरिक्त चावल से तैयार इथेनॉल की कीमत करीब 60.32 रुपये प्रति लीटर है. वहीं, मक्के से बने इथेनॉल की कीमत 71.86 रुपये प्रति लीटर और गन्ने से बने इथेनॉल की कीमत 65.61 रुपये प्रति लीटर है. 30 जुलाई को लोकसभा में सरकार की ओर से दिए गए जवाब के मुताबिक, इथेनॉल की औसत एक्स-मिल कीमत 66.61 रुपये प्रति लीटर रही. अब इसकी तुलना कच्चे तेल की लागत से करें. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 91 डॉलर प्रति बैरल हो, तो भारत के लिए इसकी आयात लागत करीब 48 रुपये प्रति लीटर बैठती है. इसमें 7 से 9 रुपये प्रति लीटर की प्रोसेसिंग लागत जोड़ने पर पेट्रोल के लिए कच्चे तेल की प्रभावी लागत करीब 55 रुपये प्रति लीटर हो जाती है.

पंजाब के पूर्व स्पेशल चीफ सेक्रेटरी केबीएस सिद्धू ने फाइनेंशियल एक्सप्रेस डिजिटल से कहा कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से वास्तविक आर्थिक फायदा तभी ज्यादा स्पष्ट होगा, जब कच्चे तेल की कीमत करीब 120-130 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर पहुंच जाए. हालांकि, हाल के अंतरराष्ट्रीय बाजार के आंकड़ों को देखें तो ऐसी स्थिति फिलहाल काफी दूर नजर आती है. 7 अप्रैल को ईरान-अमेरिका तनाव के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची थी, जबकि 21 अगस्त को यह लगभग 86 डॉलर प्रति बैरल रही. ऐसे में मौजूदा कीमतों के आधार पर सवाल उठता है कि क्या तेल मार्केटिंग कंपनियां अपेक्षाकृत सस्ते पेट्रोल में उससे महंगा एथेनॉल मिला रही हैं. FCI से मिलने वाला सस्ता चावल इस अंतर को कुछ हद तक कम करता है. लेकिन अगर यह सब्सिडी वाली फीडस्टॉक सप्लाई हटा दी जाए, तो एथेनॉल और कच्चे तेल की लागत के बीच का अंतर और ज्यादा साफ नजर आ सकता है.
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट सुधीर पंवार ने इंडिया टुडे डिजिटल से कहा कि अगर डिस्टिलर्स को खुले बाजार से MSP के आसपास की कीमत पर चावल खरीदना पड़े, तो उस चावल से तैयार होने वाला एथेनॉल सबसे महंगा फीडस्टॉक आधारित एथेनॉल होगा. उनके मुताबिक, पहले पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम यानी PDS के तहत दिए जाने वाले चावल में 25 फीसदी तक टूटे चावल की अनुमति थी. अब सरकार इस हिस्से को घटाकर 10 फीसदी करने की दिशा में बढ़ रही है, जबकि बाकी 15 फीसदी टूटे चावल को एथेनॉल उद्योग के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है. फूड सेक्रेटरी संजीव चोपड़ा ने मार्च में कहा था कि एक कैबिनेट नोट के जरिए प्रस्ताव रखा जाएगा, जिसके तहत PDS में वितरित होने वाले अनाज में टूटे चावल की हिस्सेदारी 25 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी की जाएगी. PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, चोपड़ा ने कहा था कि इस बदलाव से एथेनॉल डिस्टिलर्स के लिए हर साल करीब 90 लाख टन टूटे चावल उपलब्ध कराया जा सकेगा. पंवार का दावा है कि FCI ने टूटे चावल के लिए एक अलग कैटेगरी भी बनाई है, जिसमें से 15 फीसदी हिस्सा एथेनॉल डिस्टिलिंग इंडस्ट्री के लिए आरक्षित किया गया है. हालांकि, इस व्यवस्था और इसकी वास्तविक भूमिका को लेकर अलग-अलग पक्षों के बीच मतभेद हैं.

एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम सिर्फ पेट्रोल और तेल की कीमतों से जुड़ा मुद्दा नहीं है. इसका असर खेती के पैटर्न, जमीन के इस्तेमाल और पानी की खपत पर भी पड़ सकता है. गन्ने का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में बढ़ने से भारत के चीनी बाजार पर असर पड़ने की चिंता भी जताई गई है. भारत दुनिया के बड़े चीनी निर्यातकों में शामिल है, लेकिन घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सरकार को चीनी आयात से जुड़े फैसलों में भी बदलाव करना पड़ा है. इसी तरह, मक्के की बढ़ती मांग का असर पोल्ट्री उद्योग पर भी पड़ सकता है, क्योंकि मक्का अंडा और चिकन उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख फीड में शामिल है. इसकी मांग बढ़ने से लागत बढ़ने का दबाव बन सकता है. इस पूरी बहस का एक अहम सवाल किसानों से भी जुड़ा है. चाहे उन्हें अन्नदाता कहा जाए या ऊर्जादाता, उन्हें उनकी फसल के लिए MSP के आसपास ही भुगतान मिलता है, जबकि उसी कच्चे माल से बनने वाले एथेनॉल और उससे जुड़े पूरे कारोबार की आर्थिक संरचना कहीं ज्यादा जटिल है.
सरकार ने EBP प्रोग्राम के जरिए पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और एथेनॉल के लिए एक बड़ा घरेलू बाजार तैयार करने की कोशिश की. इसके लिए देश में डिस्टिलरी क्षमता बढ़ी, निवेश हुआ और एथेनॉल उत्पादन का पूरा इकोसिस्टम तेजी से तैयार किया गया. लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि इस मॉडल की वास्तविक आर्थिक लागत कितनी है. तेल कंपनियां कई मौकों पर अपेक्षाकृत सस्ते पेट्रोल में महंगा एथेनॉल मिला रही हैं. दूसरी ओर, FCI के अतिरिक्त चावल को कम कीमत पर उपलब्ध कराने से एथेनॉल की लागत कुछ हद तक नीचे आती है. इसका मतलब यह है कि सरकारी खाद्यान्न भंडार इस पूरे मॉडल की अर्थव्यवस्था को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है: आखिर इस व्यवस्था में सब्सिडी किसे मिल रही है और उसका बोझ कौन उठा रहा है? एक तरफ टैक्सपेयर्स के पैसे से खरीदा गया अनाज FCI के जरिए कम कीमत पर डिस्टिलर्स को उपलब्ध कराया जा रहा है. दूसरी तरफ, उपभोक्ताओं को ऐसे समय में E20 जैसे ईंधन का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, जब सड़क पर मौजूद बड़ी संख्या में पुराने वाहन इसके लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं. इसलिए बहस सिर्फ यह नहीं है कि भारत को एथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ानी चाहिए या नहीं. असली सवाल यह है कि खाद्य सुरक्षा, किसानों, टैक्सपेयर्स, उपभोक्ताओं और तेल कंपनियों के बीच इस पूरी व्यवस्था का आर्थिक फायदा आखिर किसके हिस्से में जा रहा है.

(साभार इंडिया टुडे)

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