135 KM नाप चुके फौलादी कदम, गैरसैंण अभी बाकी; मां धारी देवी के आंचल में पहुंचा जन-संग्राम

देहरादून। उत्तराखंड के स्वाभिमान और ऐतिहासिक गैरसैण हक की पुनरुत्थापना के लिए 15 अगस्त को देहरादून के अस्थाई विधानभवन से फूटा जनाक्रोश अब एक अपराजित जन-आंदोलन की रूपरेखा ले चुका है। ‘स्थाई राजधानी गैरसैण समिति’ के बैनर तले निकाली जा रही “प्रण से प्राण तक – राजधानी गैरसैण” पदयात्रा अपने 9वें दिन 135 किलोमीटर का बीहड़ मार्ग पार कर आज सिद्धपीठ मां धारी देवी के पावन प्रांगण में दाखिल हुई। सत्ता के ठंडे रुख को सीधी चुनौती देता यह कारवां अब अपने निर्णायक पड़ाव की ओर अग्रसर है।

इस आंदोलन का सबसे मजबूत स्तंभ 60 से 80 वर्ष की उम्र के वयोवृद्ध आंदोलनकारी बने हुए हैं, जो बिना थके सड़कों पर डटे हैं। यात्रा के दौरान आज वरिष्ठ आंदोलनकारी नारायण सिंह बिष्ट जी का स्वास्थ्य अचानक अत्यधिक बिगड़ गया। भीषण धूप और थकावट के बावजूद पदयात्रीओ के तेवर ढीले नहीं पड़े, 26 वर्षों से सत्ता का उपभोग कर रहे हुक्मरानों की यह बेरुखी आंदोलनकारियों के इरादों को और मजबूत कर रही है। जो व्यवस्था 60-76 साल के बुजुर्गों को सड़क पर उतरने को मजबूर कर दे, उसकी संवेदनहीनता उजागर हो चुकी है। 26 सालों से चले आ रहे इस छलावे को अब जनता खुद समाप्त करेगी।

धारी देवी क्षेत्र में आगमन पर स्थानीय निवासियों और मातृशक्ति ने ढोल-दमाऊ की गूंज और पुष्पवर्षा के साथ पदयात्रियों का आत्मीय व ऊर्जावान स्वागत किया।  13 अगस्त को ही हो चुका है इस व्यवस्था का प्रतीकात्मक तर्पण  26 वर्षों के इस लंबे इंतजार पर कड़ा ऐतराज जताते हुए यात्रा के संयोजक एवं पूर्व आईएएस अधिकारी विनोद प्रसाद रतूड़ी ने कहा: बीते 13 अगस्त को आंदोलनकारियों का सामूहिक मुंडन केवल विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि इस गूंगी-बहरी व्यवस्था का प्रतीकात्मक तर्पण था। हमारे साथियों की बिगड़ती तबीयत इस सरकार की निष्ठुरता का प्रमाण है, पर हम गैरसैण की दहलीज लांघे बिना पीछे नहीं हटेंगे।

76 वर्षीय वरिष्ठ आंदोलनकारी गोपाल दत्त कुमेड़ी, रामेश्वर शर्मा, नीरज नैथानी, योगेश उनियाल, सुधीर गैरौला, दान सिंह मिंगवाल, और दयाल सिंह राणा का जत्था बिना रुके निरंतर आगे बढ़ रहा है। समिति ने अंतिम संकल्प दोहराया है कि सिद्धपीठ मां धारी देवी का आशीर्वाद लेकर यह यात्रा जैसे ही गैरसैण पहुंचेगी, वहां अनिर्दिष्टकालीन अनशन का शंखनाद होगा। जब तक गैरसैण को उत्तराखंड की पूर्णकालिक एवं स्थाई राजधानी घोषित करने का वैधानिक कदम नहीं उठाया जाता, यह जन-संग्राम जारी रहेगा।

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