

UKD ने धामी सरकार से मांगा स्पष्टीकरण — UJVNL-THDC की योजना छोड़कर निजी कंपनी को क्यों दिया जावक, टेंडर की 84 शर्तों में बदलाव की मांगी स्वतंत्र जांच
देहरादून। उत्तराखंड सरकार का अदाणी पावर के साथ हुआ बिजली करार अब राजनीतिक गलियारों में गर्म हो गया है। उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) ने राज्य सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए पूछा है कि आखिर यह 25 वर्षों तक चलने वाली बिजली खरीद प्रतिबद्धता राज्य के पक्ष में है या इसका पूरा फायदा एक निजी कंपनी तक पहुंच रहा है। पार्टी के केंद्रीय महामंत्री राजेंद्र सिंह बिष्ट ने धामी सरकार से पूरे टेंडर प्रक्रिया और समझौते को जनता के सामने रखने की मांग की है।
बिष्ट ने बताया कि इस करार के तहत अदाणी पावर की छत्तीसगढ़ स्थित संयंत्र से 1320 मेगावाट बिजली 25 वर्षों तक ₹5.746 प्रति यूनिट की दर से उत्तराखंड को मिलेगी। उन्होंने गणना पेश करते हुए कहा कि अगर इस 1320 मेगावाट बिजली को 25 वर्षों तक लगातार 24 घंटे की क्षमता पर आंका जाए, तो कुल रकम लगभग ₹1.66 लाख करोड़ के करीब पहुंचती है। बिष्ट का तर्क है कि इतनी विशाल दीर्घकालीन वित्तीय प्रतिबद्धता पर हर पहलू की सार्वजनिक जांच और पूरी पारदर्शिता होना जरूरी है।
UKD नेता ने इस पूरी प्रक्रिया की अंदरूनी कहानी पर सबसे बड़ा सवाल उठाया। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2024 में UJVNL और THDC के संयुक्त उपक्रम के जरिए 1320 मेगावाट की यह परियोजना विकसित करने की पहल हुई थी। बिष्ट ने पूछा, “जब सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से परियोजना का रास्ता तय हो चुका था, तो उसे बीच में क्यों छोड़ा गया? इसके बाद UPCL द्वारा नया टेंडर जारी करने और अब अदाणी पावर से करार तय करने की पूरी प्रक्रिया पर सरकार को साफ स्पष्टीकरण देना होगा।”
उन्होंने यह भी जानना चाहा कि परियोजना उत्तराखंड में क्यों नहीं लगाई जा रही और छत्तीसगढ़ को इसके लिए चुनने का निर्णय किस आधार पर लिया गया। उनके अनुसार छत्तीसगढ़ से उत्तराखंड तक बिजली पहुंचाने में ट्रांसमिशन और दूसरी अतिरिक्त लागतों का बोझ आखिर किस पर आएगा — यह भी स्पष्ट नहीं है। साथ ही उन्होंने कहा कि ₹5.746 प्रति यूनिट की दर में फिक्स्ड चार्ज, ऊर्जा शुल्क, ट्रांसमिशन और अन्य खर्चों का वास्तविक विभाजन भी सामने आना चाहिए।
टेंडर प्रक्रिया को लेकर बिष्ट ने गंभीर आरोप लगाया कि निविदा आवंटन के दौरान 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किए गए। उन्होंने सरकार से मूल और संशोधित — दोनों टेंडर दस्तावेज तुरंत सार्वजनिक करने की मांग की। उनकी मांग है कि यह भी जांचा जाए कि इन बदलावों से निविदा की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हुई या नहीं, और इसके लिए स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
बिष्ट ने इस बात पर अफसोस जताया कि अगर यह 1320 मेगावाट की परियोजना राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों के जरिए विकसित होती, तो उत्तराखंड को स्थानीय रोजगार, तकनीकी प्रशिक्षण, निर्माण कार्य और आर्थिक गतिविधियों के बड़े अवसर मिल सकते थे। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक उपक्रमों को मजबूत करना और राज्य के युवाओं के लिए रोजगार व आर्थिक गतिविधियों के मौके बढ़ाना जरूरी है।
अपने बयान में बिष्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड केवल बिजली खरीदने वाला राज्य नहीं है, बल्कि देश के प्रमुख ऊर्जा उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। ऐसे में 25 वर्षों की इतनी बड़ी प्रतिबद्धता से जुड़ा हर वित्तीय पहलू जनता के सामने होना चाहिए, क्योंकि जनता को पूरे सौदे का हिसाब जानने का अधिकार है।
उन्होंने सरकार से यह भी मांग किया कि 1320 मेगावाट बिजली करार से जुड़ा पूरा टेंडर, सभी मूल एवं संशोधित शर्तें, पावर सप्लाई एग्रीमेंट, टैरिफ गणना, ट्रांसमिशन लागत और 25 वर्षों की अनुमानित कुल वित्तीय देनदारी सार्वजनिक की जाए। बिष्ट का कहना है कि मामले की स्वतंत्र जांच कराकर यह साबित किया जाना चाहिए कि यह व्यवस्था उत्तराखंड के दीर्घकालीन हितों में किस तरह लाभकारी है।

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