

उत्तराखंड में बिजली डील पर छिड़ा संग्राम: क्या 1.6 लाख करोड़ के ‘खेल’ में फंसा सरकारी खजाना? जानें 1320 मेगावाट प्रोजेक्ट का पूरा सच!
देहरादून। उत्तराखंड में 1320 मेगावाट थर्मल पावर खरीद समझौते को लेकर सियासत पूरी तरह गर्मा गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा इस पूरी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं, टेंडर शर्तों में फेरबदल और एक निजी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई है। बढ़ते सियासी बवाल को देखते हुए शासन ने मोर्चा संभाला है और ऊर्जा विभाग ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे राज्य की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए उठाया गया पारदर्शी कदम बताया है।
मामले की शुरुआत कांग्रेस द्वारा लगाए गए तीखे आरोपों से हुई। विपक्षी दल ने दावा किया कि निविदा की कुल 86 शर्तों में से 84 में अचानक संशोधन कर दिए गए, ताकि छत्तीसगढ़ के कोरबा स्थित निजी संयंत्र से बिजली लेने का रास्ता साफ हो सके। विपक्ष का आरोप है कि संयंत्र को राज्य से बाहर लगाने की छूट देने के साथ-साथ 1,000 किलोमीटर से अधिक लंबी दूरी की ट्रांसमिशन लागत का भारी बोझ बोलीदाता के बजाय सीधे उत्तराखंड की जनता और सरकारी खजाने पर डाल दिया गया। इसके अलावा, फिक्स्ड चार्ज की सीलिंग को 70% से बढ़ाकर 75% करने और बिजली न उठाने की स्थिति में भी भुगतान बाध्यकारी करने जैसे नियमों पर सवाल उठाते हुए दावा किया गया कि 25 वर्षों में राज्य के उपभोक्ताओं पर करीब 1.60 लाख करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ेगा। कांग्रेस ने यह सवाल भी उठाया कि जब UJVNL और THDC के सरकारी संयुक्त उपक्रम से परियोजना बन सकती थी, तो उसे दरकिनार कर निजी कंपनी से ₹5.746 प्रति यूनिट की दर पर समझौता क्यों किया गया?
विपक्ष के इन हमलों का कड़ा संज्ञान लेते हुए उत्तराखंड के प्रमुख सचिव (ऊर्जा) डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम ने बिंदुवार तथ्यात्मक स्पष्टीकरण जारी किया। शासन की ओर से कहा गया कि पूरी प्रक्रिया पूरी तरह प्रतिस्पर्धी, पारदर्शी और उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) की देखरेख में संचालित हो रही है। डॉ. सुंदरम के अनुसार, Request for Quotation (RFQ) चरण में 5 कंपनियां योग्य पाई गई हैं और अंतिम चयन केवल न्यूनतम प्रतिस्पर्धी टैरिफ के आधार पर होगा।
उत्तराखंड की पर्यावरणीय संवेदनशीलता और कोयले की परिवहन लागत का हवाला देते हुए प्रमुख सचिव ने स्पष्ट किया कि प्लांट को देश में कहीं भी स्थापित करने का विकल्प इसलिए दिया गया ताकि उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली मिल सके, हालांकि राज्य के भीतर प्लांट लगाने पर भी कोई रोक नहीं है। फिक्स्ड चार्ज में बदलाव को बोलीदाताओं के व्यावहारिक सुझावों और नियामक आयोग की मंजूरी का परिणाम बताया गया। उन्होंने साफ किया कि ₹1.60 लाख करोड़ का आंकड़ा 25 सालों में होने वाला कुल अनुमानित भुगतान है, न कि कोई एकमुश्त राशि। वहीं, THDC-UJVNL के संयुक्त उपक्रम पर विचार न बन पाने के पीछे THDC की मुख्य विशेषता जल विद्युत में होना और NTPC की कॉर्पोरेट नीतियों की बाध्यताओं को वजह बताया गया। सरकार का दावा है कि राज्य की भविष्य की बेस-लोड जरूरतों को देखते हुए यह फैसला नियमानुसार और निष्पक्ष रूप से लिया गया है।

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