देहरादून। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने राज्य सरकार से वन अधिकार अधिनियम, 2006 (एफआरए) को तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग करते हुए कहा है कि यह कानून ही वन भूमि में दशकों से निवास कर रहे लोगों को राहत देने का एकमात्र रास्ता है।
धस्माना ने बताया कि प्रदेश की लगभग 67 प्रतिशत भूमि वन क्षेत्र में आती है, जिसमें से 47 प्रतिशत भाग वन है, जबकि शेष लगभग 20 प्रतिशत भूमि कैसेरीन व अन्य वनभूमि के रूप में दर्ज है। इन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति, जनजातियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के अनेक लोग पीढ़ियों से बसे हुए हैं तथा खेती-पशुपालन कर आजीविका चला रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ऋषिकेश के पशुलोक क्षेत्र में लगभग 3000 हेक्टेयर भूमि पर इसी प्रकार की बसावटें हैं। इस विषय को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है और हाल ही में अदालत के निर्देश पर राज्य सरकार ने जांच समिति का गठन किया है। इसी मुद्दे को लेकर पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच टकराव की घटनाएं भी हुई हैं।
धस्माना ने कहा कि वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र की यूपीए सरकार ने यह अधिनियम पारित किया था, जिसका उद्देश्य वनवासियों—विशेषकर अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पारंपरिक वनवासियों—के ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करना था। इस कानून से उनकी भूधृति, आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि सरकार यह अधिनियम प्रदेश में प्रभावी रूप से लागू करे तो वन भूमि में पारंपरिक रूप से बसे लोगों को अतिक्रमण के नाम पर बेदखल होने से बचाया जा सकता है। उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया कि ऋषिकेश पशुलोक सहित राज्य के अन्य क्षेत्रों में रह रहे इन लोगों को उजड़ने से बचाने के लिए वन अधिकार अधिनियम को तुरंत लागू किया जाए।

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