उत्तराखंड के सादगी पसंद नेता ‘भगत दा’ को पद्म भूषण सम्मान

गरीबी से संघर्ष कर निकले, लेक्चरर की नौकरी छोड़कर बने सीएम और राज्यपाल, आपातकाल में झेली जेल

देहरादून। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कारों की सूची में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (83) का नाम शामिल है। उन्हें सार्वजनिक जीवन में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया जाएगा। राजनीति में ‘भगत दा’ के नाम से पहचाने जाने वाले कोश्यारी की यह उपलब्धि उत्तराखंड के लिए गौरव का विषय मानी जा रही है।

गृह मंत्रालय द्वारा जारी 131 नामों की सूची में कोश्यारी को यह सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई है। पद्म पुरस्कारों की घोषणा प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस पर होती है, जबकि सम्मान समारोह मार्च-अप्रैल में राष्ट्रपति भवन में आयोजित किया जाता है।

इस घोषणा के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भगत सिंह कोश्यारी को बधाई देते हुए कहा कि यह सम्मान समस्त उत्तराखंडवासियों के लिए प्रसन्नता और गौरव का क्षण है। उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार कोश्यारी जी के समर्पित सार्वजनिक जीवन, राष्ट्र सेवा और समाजहित के प्रति उनकी निष्ठा का स्पष्ट प्रमाण है। उनके विचार और कार्य ने न सिर्फ उत्तराखंड बल्कि पूरे देश को दिशा दी है।

भगत सिंह कोश्यारी का जन्म 17 जून, 1942 को बागेश्वर जिले के पलानाधुरा गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। पिता गोपाल सिंह खेती करते थे और मां मोतिमा देवी गृहिणी थीं। आर्थिक तंगी में बीते बचपन ने उनमें सादगी और मेहनत के गुण विकसित किए।

शिक्षा प्राप्ति का सफर भी संघर्षों भरा रहा। प्राथमिक शिक्षा महरगाड़ से प्राप्त करने के बाद जूनियर हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए उन्हें रोजाना 8 किलोमीटर पैदल चलकर शामा जाना पड़ता था। हाईस्कूल कपकोट से और इंटरमीडिएट की पढ़ाई पिथौरागढ़ से पूरी करने के बाद, उन्होंने अल्मोड़ा कॉलेज से बीए और अंग्रेजी में एमए किया।

एमए के बाद 1964 में वे उत्तर प्रदेश के एटा जिले के राजा रामपुर इंटर कॉलेज में अंग्रेजी के प्रवक्ता नियुक्त हुए। कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद वे पहाड़ की ओर लौट आए और पिथौरागढ़ को अपनी कर्मभूमि बना लिया। यहीं से उनका सामाजिक-राजनीतिक सफर और मजबूत हुआ। 1966 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संपर्क में आए और जल्द ही संगठन से पूरी तरह जुड़ गए, एक प्रचारक के रूप में लंबे समय तक संगठनात्मक कार्य किया।

1975 में उन्होंने ‘पर्वत पीयूष’ साप्ताहिक समाचार पत्र का संपादन और प्रकाशन शुरू किया, जिसके माध्यम से उन्होंने पहाड़ की जनसमस्याओं को मुखरता से उठाया। उत्तराखंड राज्य निर्माण के आंदोलन को आगे बढ़ाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने ‘उत्तरांचल प्रदेश क्यों?’ नामक पुस्तिका लिखकर इस मांग को तार्किक आधार प्रदान किया।

देश में लगे आपातकाल (1975-77) के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वे 3 जुलाई, 1975 से लेकर 23 मार्च, 1977 तक अल्मोड़ा और फतेहगढ़ की जेल में बंद रहे। इस कठिन समय में भी वे अपने साथी कैदियों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहे।

छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाले कोश्यारी ने 1989 में अल्मोड़ा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, हालांकि सफलता नहीं मिली। इसके बाद वे विधान परिषद के सदस्य बने और उत्तराखंड राज्य गठन के बाद मंत्री पद भी संभाला। अक्टूबर 2001 से मार्च 2002 तक वे उत्तराखंड के दूसरे मुख्यमंत्री रहे।

मुख्यमंत्री पद के बाद भी उनकी सक्रियता बनी रही। वे 2008 से 2014 तक उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद रहे। 2014 के आम चुनाव में उन्होंने नैनीताल-उधमसिंह नगर लोकसभा सीट से जीत दर्ज कर संसद के निचले सदन में भी प्रवेश किया। इस प्रकार उन्हें दोनों सदनों में प्रतिनिधित्व करने का गौरव प्राप्त हुआ।

सितंबर 2019 में उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया गया और कुछ समय के लिए गोवा का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया। महाराष्ट्र में उनका कार्यकाल कई राजनीतिक उठा-पटक के दौरान चर्चा में रहा।

83 वर्ष की आयु में मिला यह राष्ट्रीय सम्मान, भगत सिंह कोश्यारी के उस दीर्घकालिक और समर्पित जीवन यात्रा का प्रतीक है, जो एक गरीब किसान परिवार से शुरू होकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुंची और जिसमें शिक्षक, पत्रकार, समाजसेवी, विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री और राज्यपाल के दायित्वों का निर्वहन शामिल है।

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