

लेखक – दिनेश पंत
बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा खतरे में, हादसे के बाद थाना-कचहरी से पहले जिम्मेदारी तय करने की जरूरत:
एनएच और रिहायशी इलाकों में मवेशियों के झुंड से बढ़ रहा दुर्घटनाओं का खतरा, जिम्मेदारी तय करने की जरूरत
देहरादून। राजधानी देहरादून के वन क्षेत्रों से लगे इलाकों में मवेशियों के बड़े झुंडों का रिहायशी बस्तियों और व्यस्त सड़कों तक पहुंचना अब आम लोगों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। खासकर राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) और व्यस्त संपर्क मार्गों पर एक साथ बड़ी संख्या में मवेशियों के पहुंचने से वाहन चालकों के सामने अचानक खतरा पैदा हो जाता है।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि कई स्थानों पर ये मवेशी अकेले या भटकते हुए नहीं, बल्कि झुंड के रूप में दिखाई देते हैं। उन्हें सड़क पर हांकते हुए लोग भी नजर आते हैं। इसके बाद सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि पशुओं को जंगल और वन क्षेत्र में ही रखा जाता है तो उन्हें आबादी और मुख्य सड़कों तक लाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है?
वन गुर्जर समुदाय की पारंपरिक आजीविका पशुपालन से जुड़ी रही है। वन क्षेत्र उनके जीवन और पशुओं के लिए महत्वपूर्ण आधार हैं। ऐसे में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या जंगल में उपलब्ध चराई व्यवस्था पर्याप्त नहीं है या फिर शहर से सटे इलाकों में मवेशियों को लाने के पीछे कोई अन्य व्यावहारिक या आर्थिक कारण है।
स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी चिंता सड़क सुरक्षा को लेकर है। सड़क पर अचानक 40, 50 या उससे अधिक मवेशियों का झुंड सामने आ जाए तो वाहन चालक के लिए स्थिति संभालना मुश्किल हो सकता है। खासकर दोपहिया वाहन चालकों के लिए जोखिम अधिक रहता है। मवेशी किसी दिशा में अचानक मुड़ सकते हैं और वाहन चालक को प्रतिक्रिया देने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
स्थिति उस समय और गंभीर हो जाती है जब यही झुंड रिहायशी कॉलोनियों और गलियों में पहुंच जाते हैं। इन इलाकों में बच्चे और बुजुर्ग बड़ी संख्या में पैदल चलते हैं। पशुओं का स्वभाव अचानक बदल सकता है। किसी बच्चे का उनके नजदीक पहुंच जाना या किसी पशु का अचानक आक्रामक हो जाना गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकता है।
ऐसे में सवाल केवल यह नहीं कि मवेशी सड़क पर क्यों हैं, बल्कि यह भी है कि उन्हें सड़क और आबादी तक पहुंचने से रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?
विडंबना यह है कि जब तक कोई हादसा नहीं होता, तब तक ऐसी घटनाओं को सामान्य मान लिया जाता है। लेकिन यदि किसी दिन कोई बच्चा मवेशियों की चपेट में आ जाए, कोई बुजुर्ग घायल हो जाए या कोई बाइक सवार वाहन सहित सड़क पर गिर जाए, तब मामला पुलिस और प्रशासन तक पहुंचना तय है।
इसके बाद वही पुराना सिलसिला शुरू होगा—थाना, अस्पताल, बयान, जांच और मुआवजे की मांग।
सवाल यह है कि क्या किसी दुर्घटना का इंतजार करना जरूरी है?
प्रशासन के सामने सबसे पहले यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि वन क्षेत्रों से लगे शहरी इलाकों में पशुओं की आवाजाही की वास्तविक स्थिति क्या है। कितने पशु हैं, उनके मालिक कौन हैं, वे किन क्षेत्रों में चरते हैं और किन रास्तों से आबादी तक पहुंचते हैं—इसका कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड है या नहीं, यह भी सामने आना चाहिए।
यदि मवेशियों को जानबूझकर जंगल से निकालकर राष्ट्रीय राजमार्ग अथवा रिहायशी इलाकों तक लाया जाता है तो इसके कारणों की भी जांच होनी चाहिए। यदि ऐसा नियमों के अनुरूप है तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन परिस्थितियों में इसकी अनुमति है। और यदि नियमों का उल्लंघन है तो कार्रवाई की व्यवस्था क्या है?
किसी भी समुदाय की आजीविका का सम्मान जरूरी है, लेकिन नागरिकों की सुरक्षा उससे कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकती।
यहां स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। विधायक, पार्षद और अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों को इस समस्या को केवल छोटी स्थानीय शिकायत मानने के बजाय वन विभाग, पुलिस, नगर निकाय और प्रशासन के साथ मिलकर इसका स्थायी समाधान तलाशना चाहिए।
सरकार चाहे तो ऐसे संवेदनशील मार्गों की पहचान कर सकती है जहां मवेशियों की आवाजाही से दुर्घटनाओं का खतरा अधिक है। पशुओं की पहचान और मालिकों का रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है। आबादी वाले क्षेत्रों में पशुओं को खुले में छोड़ने पर जिम्मेदारी तय की जा सकती है और वन क्षेत्र से शहर की ओर होने वाली अनावश्यक आवाजाही को नियंत्रित किया जा सकता है।
इस पूरे मामले में एक और बात बेहद महत्वपूर्ण है। मवेशियों को दोष देना सबसे आसान काम है।
जानवर आखिर जानवर है। उसे यह नहीं मालूम कि यह एनएच है, यह रिहायशी कॉलोनी है या यहां से तेज रफ्तार वाहन गुजरते हैं।
लेकिन जो व्यक्ति उन मवेशियों को लेकर वहां तक पहुंचता है, वह यह जरूर जानता है।
इसलिए सवाल जानवर से नहीं, व्यवस्था और जिम्मेदार व्यक्ति से होना चाहिए।
जंगल में रहने वाले पशुओं का शहर की सड़कों तक पहुंचना यदि मजबूरी है तो सरकार उसका समाधान करे और यदि यह सुविधा के लिए किया जा रहा है तो जिम्मेदारी भी तय हो।
देहरादून जैसे तेजी से फैलते शहर में वन और आबादी के बीच दूरी लगातार कम हो रही है। ऐसे में मानव-पशु संघर्ष के नए रूप सामने आना स्वाभाविक है। लेकिन सड़क सुरक्षा को नजरअंदाज करके किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
आज मवेशियों का झुंड सड़क रोक रहा है।
कल वही झुंड किसी वाहन से टकरा सकता है।
और उसके बाद सवाल सिर्फ यह नहीं रहेगा कि मवेशी सड़क पर क्यों आए।
सवाल होगा:- जब खतरा रोज दिखाई दे रहा था तो प्रशासन ने उसे रोकने के लिए किया क्या?
सरकार और जनप्रतिनिधियों को इस सवाल का जवाब दुर्घटना के बाद नहीं, दुर्घटना से पहले देना होगा।
क्योंकि किसी परिवार का बच्चा या बुजुर्ग घायल होने के बाद यह कहना कि “घटना दुर्भाग्यपूर्ण है” व्यवस्था की जिम्मेदारी पूरी नहीं करता।
सड़क पर खतरा दिखाई दे और फिर भी व्यवस्था आंखें बंद रखे, तो उसे हादसा नहीं, व्यवस्था की लापरवाही कहना ज्यादा उचित होगा।

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