
हवन की धुएं में उठी हुंकार: मोदी-शाह-धामी के मुखौटे पहन आंदोलनकारियों ने पूछा – कब तक होगा पहाड़ से छल?
देहरादून। गैरसैंण को उत्तराखंड की स्थायी राजधानी घोषित कराने की मांग को लेकर चल रहे क्रमिक अनशन ने सोमवार को 100 दिन का ऐतिहासिक पड़ाव पार कर लिया। ‘स्थायी राजधानी गैरसैंण समिति’ के बैनर तले आंदोलनकारियों का संयम अब आक्रोश में बदल चुका है और इसकी झलक उनके तीखे प्रदर्शन में साफ दिखी।
सुबह की शुरुआत यज्ञ-हवन से हुई, जिसमें आंदोलनकारियों ने देश-प्रदेश के शीर्ष नेताओं की “सोई हुई सद्बुद्धि” जागृत करने की आहुतियां दीं। इसके तुरंत बाद का दृश्य और भी तल्ख था — प्रदर्शनकारियों ने सरकार को सीधे “भैंस” की उपमा देते हुए उसके आगे बीन बजाई और हुंकार भरी कि 100 दिनों के अनशन, पहाड़ की जनता के आंसुओं और संघर्ष से इस सरकार को रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा।
प्रदर्शन का सबसे धारदार दृश्य तब सामने आया जब आंदोलनकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज और विधायकों विनोद चमोली व दिलीप रावत के मुखौटे पहनकर व्यंग्य नाटक खेला। “हम पहाड़ों की भावनाओं को कुचल देंगे, लेकिन गैरसैंण को राजधानी नहीं बनाएंगे” — इस संवाद के जरिए नेताओं के दोहरे चरित्र की बखिया उधेड़ी गई। आंदोलनकारियों ने कहा कि ये वही नेता हैं जो मंचों पर ‘जय पहाड़ी’ का खोखला नारा लगाते हैं और खुद दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में ऐश करते हैं।

क्रमिक अनशन पर डटे गोपाल दत्त कुमेडी के हौसले को सलाम करने के लिए इस अवसर पर भारी जनसैलाब उमड़ा। पूर्व आईएएस विनोद प्रसाद रतूड़ी, ब्रिगेडियर सर्वेश डंगवाल, पार्थ रतूड़ी, मनमोहन शर्मा, सचिन थपलियाल सहित बड़ी संख्या में वरिष्ठ आंदोलनकारियों और मातृशक्ति ने एक स्वर में प्रतिज्ञा ली — जब तक गैरसैंण को स्थायी राजधानी का आधिकारिक दर्जा नहीं मिलता, यह आंदोलन थमेगा नहीं।
राज्य गठन के दो दशक से अधिक समय बाद भी गैरसैंण की उपेक्षा पर आंदोलनकारियों का कहना था — “उत्तराखंड का बच्चा-बच्चा जानता है कि इसके असली दोषी वही नेता हैं, जिन्होंने पहाड़ को केवल लूटा है।”


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