नई दिल्ली। संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र के दौरान लोकसभा में महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनावों से लागू करने के उद्देश्य से पेश किए गए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। मत विभाजन में विधेयक पक्ष में 298 वोट और विरोध में 230 वोट पड़े, जिसके कारण यह गिर गया। सरकार के साथ परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक भी आगे नहीं बढ़ सके।
पृष्ठभूमि और क्या था बिल?
2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक) में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। यह आरक्षण 15 साल के लिए होगा और SC/ST महिलाओं के लिए भी सब-कोटा शामिल है। लेकिन मूल अधिनियम लागू होने के लिए जनगणना और परिसीमन (delimitation) जरूरी था, जिससे इसमें देरी हो रही थी।
सरकार ने इस विशेष सत्र (16-18 अप्रैल 2026) में तीन बिल पेश किए:
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026: महिला आरक्षण को 2029 चुनाव से पहले लागू करने के लिए मूल अधिनियम में संशोधन।
- परिसीमन विधेयक, 2026: लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 (राज्यों के लिए 815 + केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35) करने का प्रस्ताव, ताकि महिलाओं को आरक्षण देने पर पुरुष सांसदों की संख्या कम न हो।
- केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026: दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी में भी आरक्षण लागू करने के लिए।
सरकार का दावा था कि इससे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी और लोकसभा में वर्तमान ~14% महिला प्रतिनिधित्व में सुधार होगा।
विपक्ष का विरोध क्यों?
विपक्ष (कांग्रेस, DMK, TMC, SP आदि) ने बिल का समर्थन करने से इनकार कर दिया। मुख्य आपत्तियां:
- परिसीमन को जाति जनगणना से जोड़ने की मांग।
- दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु) का डर कि जनसंख्या के आधार पर उत्तर भारत को ज्यादा सीटें मिलेंगी, जिससे उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
- सरकार पर आरोप कि महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन की “छुपी हुई” योजना को आगे बढ़ाया जा रहा है।
नेता विपक्ष राहुल गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं ने कहा कि बिना जाति जनगणना के बिल पास नहीं होगा। कुछ महिला सांसदों (जैसे इकरा हसन) ने भी बिल पर दुख जताया और डिलिमिटेशन के आड़ में छिपाने का आरोप लगाया।
सरकार की तरफ से गृह मंत्री अमित शाह और पीएम मोदी ने विपक्ष को क्रेडिट देने की पेशकश की। पीएम मोदी ने कहा, “अगर बिल पास हो जाए तो मैं सभी का क्रेडिट देने को तैयार हूं, होर्डिंग लगवा दूंगा।” लेकिन बातचीत सफल नहीं हुई।
मत विभाजन का गणित
- पक्ष में: 298 वोट (मुख्यतः NDA)
- विरोध में: 230 वोट (विपक्ष)
- दो-तिहाई बहुमत (लोकसभा की कुल सदस्यता के आधार पर लगभग 360+ वोट) नहीं मिला, इसलिए बिल पराजित।
इसके बाद BJP सांसदों ने कांग्रेस के खिलाफ नारेबाजी की और सदन में हंगामा हुआ।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
- सरकार: इसे “महिलाओं के सशक्तिकरण का अवसर खोने” वाला बताते हुए विपक्ष पर हमला। कुछ नेताओं ने कहा कि विपक्ष राजनीतिक स्वार्थ में महिलाओं के हितों को नजरअंदाज कर रहा है।
- विपक्ष: “सरकार ने डिलिमिटेशन को जबरन जोड़ा, हम महिला आरक्षण के पक्ष में हैं लेकिन सही तरीके से।” दक्षिणी दलों ने फेडरल स्ट्रक्चर पर खतरे का हवाला दिया।
- महिला संगठनों और कार्यकर्ताओं में मिश्रित प्रतिक्रिया—कई ने बिल गिरने पर निराशा जताई, जबकि कुछ ने कहा कि बिना OBC/जाति कोटे के आरक्षण अधूरा है।
आगे क्या?
विशेष सत्र अभी चल रहा है, लेकिन बिल गिरने से 2029 चुनाव से पहले आरक्षण लागू करने की सरकार की योजना को झटका लगा है। मूल 2023 अधिनियम अब भी जनगणना और परिसीमन के बाद ही प्रभावी होगा, जिससे 2030 के बाद लागू होने की संभावना बढ़ गई है।
विश्लेषकों का कहना है कि यह घटना NDA और विपक्ष के बीच गहरे विभाजन को उजागर करती है, खासकर परिसीमन और जनगणना जैसे मुद्दों पर। आगामी चुनावी रणनीतियों में महिला आरक्षण अब बड़ा मुद्दा बन सकता है।

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