रावण के अहंकार का अंत: शिव की लीला

हिंदू धर्म में कई अद्भूत और धार्मिक प्रसंग मिलते हैं जिन्हें जानकर हम सब बहुत अचंभित हो जाते हैं कि आखिर ये कैसे हो सकता है। ऐसा ही एक अद्भुत और रहस्यमयी प्रसंग जुड़ा है भगवान महादेव और उनके परमभक्तो में से एक माने जाने वाले  लंकापति रावण से। कहते हैं कि रावण केवल एक शक्तिशाली राजा ही नहीं, बल्कि शिव का परम भक्त भी था। कहते हैं जब भक्ति के साथ अहंकार जुड़ जाता है, तो उसका परिणाम विनाशकारी हो सकता है। एक समय ऐसा आया जब रावण के अभिमान ने उसे ऐसी राह पर खड़ा कर दिया, जहां उसे अपने ही आराध्य के क्रोध का सामना करना पड़ा। उसी घटना के बाद जन्म हुआ एक ऐसे स्तोत्र का, जो आज भी शिव भक्ति का सबसे प्रभावशाली मंत्र माना जाता है- शिव तांडव स्तोत्र। तो आइए जानते हैं इसके पीछे की कथा के बारे में- 

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय की बात है जब लंकापति रावण अपनी शक्ति और बल का बहुत अंहकार हो गया। रावण के मन में आया में सोने की लंका में रहता हूं और मेरे आराध्य कैलाश पर्वत पर रहते हैं । क्यों न भगवान शिव को भी लंका में लाया जाए। रावण ने यह सोचकर कैलाश पर्वत की और प्रस्थान कर लिया। जब रावण कैलाश पर्वत की तलहटी में पहुंचा तो सामने से भगवान शिव के वाहन नंदी आ रहे थे। 

नंदी ने प्रणाम किया लेकिन रावण अपने अंहकार में चुर था और नंदी को किसी भी प्रकार का जवाब नहीं दिया। नंदी ने जब फिर से बात की तो रावण ने उनका नंदी का अपमान करा और बताया की मैं भगवान शिव को लंका ले जाने के लिए आया हूूं। नंदी ने उत्तर में कहा कि भगवान शिव को उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई कहीं नहीं लेकर जा सकता। लेकिन रावण को अपने अभिमान और बल में चूर था। उसने कहा अगर महादेव नहीं चलेंगे तो मैं पूरे कैलाश को ही अपने साथ ले जाऊंगा। 

इतना कहते ही रावण ने अपना हाथ एक चट्टान के नीचे रखा तो कैलाश पर्वत हिलने लगा। सभी देवी देवता, देवगण चिंतित हो उठे लेकिन महादेव एक दम शांत अपने आसन पर बैठे रहें। जब रावण ने दोनों हाथों को कैलाश पर्वत की चट्टान के नीचे फंसा दिया तो भगवान शिव ने केवल अपने एक पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत को नीचे दबा दिया और रावण के हाथ वहीं पर फंस गए। रावण ने अपने हाथों को बाहर निकालने के अनेकों प्रयास किए लेकिन वह असफल रहा और दर्द और पीड़ा से करहाता हुआ रोने लगा।

ये दृश्य देख नंदी से रहा नहीं गया और उन्होंने रावण से महादेव को मनाने के लिए कहा। जिसके पश्चात रावण ने महादेव की स्तुति करते हुए शिव तांडव स्त्रोत की रचना की। उसकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मुक्त कर दिया। इसके साथ ही रावण का अहंकार भी पूरी तरह चूर हो गया।

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