
कलयुग में घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक जी को श्रीकृष्ण के वरदान के कारण श्याम बाबा कहा जाता है। खाटू धाम में उनका शीश प्रकट हुआ था इसलिए उन्हें बाबा खाटू श्याम कहते हैं। महान धनुर्धारि बर्बरीक के जन्म और उनके महान योद्धा बनने की कथा अत्यंत रोचक है। उनका जन्म द्वापर युग में महाभारत काल के दौरान हुआ था। यहाँ उनके जन्म और उनकी पृष्ठभूमि की प्रमुख जानकारी दी गई है।
1. पारिवारिक पृष्ठभूमिपांडव वंशी: बर्बरीक पांडवों के परिवार से संबंध रखते थे।
दादा: महाबली भीम।
पिता: घटोत्कच (भीम और हिडिम्बा के पुत्र)।
माता: देवी अहिलावती (प्राचीन कथाओं के अनुसार वे मौरवी के नाम से भी जानी जाती थीं)।
पांडव वंशी: बर्बरीक पांडवों के परिवार से संबंध रखते थे।
दादा: महाबली भीम।
पिता: घटोत्कच (भीम और हिडिम्बा के पुत्र)।
माता: देवी अहिलावती (प्राचीन कथाओं के अनुसार वे मौरवी के नाम से भी जानी जाती थीं)।
2. जन्म की कथा
बर्बरीक का जन्म घटोत्कच और अहिलावती के पुत्र के रूप में हुआ था। जन्म के समय उनके बाल बब्बर शेर की तरह घुंघराले थे, जिसके कारण उनका नाम ‘बर्बरीक’ रखा गया। वे बचपन से ही अत्यंत बलशाली और मेधावी थे।
3. शिक्षा और अजेय वरदान
बर्बरीक ने अपनी माता और भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें तीन अमोघ बाण प्रदान किए। इन तीन बाणों की शक्ति ऐसी थी कि वे पूरी दुनिया को समाप्त करने की क्षमता रखते थे। इसी कारण उन्हें ‘तीन बाणधारी’ भी कहा जाता है। उनकी माता ने उन्हें एक वचन देने को कहा था कि वे युद्ध में हमेशा ‘हारे हुए का सहारा’ बनेंगे। इसी वचन के कारण वे आज भी ‘हारे के सहारे’ के रूप में पूजे जाते हैं।
खाटू श्याम कैसे बने?
महाभारत युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण ने उनकी शक्ति का परीक्षण किया और धर्म की रक्षा के लिए उनका शीश दान में मांग लिया। बर्बरीक ने हंसते-हंसते अपना शीश काटकर कृष्ण को दे दिया। उनकी इस महान आहुति से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने उन्हें अपना नाम ‘श्याम’ दिया और वरदान दिया कि कलयुग में वे उनके नाम से ही पूजे जाएंगे।
अस्वीकरण (Disclaimer)
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