
मलेथा गांव के परिवार ने बेटी के जन्म को बनाया उत्सव, बदलती सोच का बना प्रेरक उदाहरण
पौड़ी गढ़वाल। आमतौर पर जहां बेटे के जन्म पर जश्न मनाया जाता है और बेटी के आने पर घर में खामोशी पसर जाती है, वहीं पौड़ी गढ़वाल के श्रीनगर क्षेत्र के एक परिवार ने इस सोच को उलट कर समाज के सामने एक नई मिसाल पेश की है। कीर्तिनगर विकासखंड के मलेथा गांव निवासी आशीष कुमार और उनकी पत्नी प्रीति के घर शुक्रवार को बेस चिकित्सालय श्रीकोट-श्रीनगर में एक नन्ही बेटी ने जन्म लिया। जच्चा और बच्चा दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं। बेटी के जन्म की खबर मिलते ही परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई और परिजनों ने ठान लिया कि इस पल को किसी आम दिन की तरह नहीं, बल्कि एक यादगार उत्सव की तरह मनाया जाएगा।
शनिवार को जब नवजात और उसकी मां को अस्पताल से घर ले जाने की बारी आई तो परिवार ने जो किया, उसने श्रीकोट बाजार और आसपास के पूरे इलाके का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। जिस कार से मां और बेटी को घर लाया जाना था, उसे फूलों और मालाओं से इस कदर सजाया गया मानो कोई बारात निकलने वाली हो। लेकिन सबसे ज्यादा जो चीज लोगों की नजर में आई, वह था कार के पिछले शीशे पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा पोस्टर — “बेटी हुई है।” बस यही तीन शब्द काफी थे। सजी हुई कार जब बाजार से गुजरी तो राहगीर ठिठककर देखने लगे। लोगों ने इस पहल की मुक्त कंठ से सराहना की और इसे बेटियों के सम्मान में उठाया एक हसीन कदम बताया।

नवजात के चाचा अंकित कुमार ने बताया कि परिवार के सभी सदस्य बेटी के आगमन से अत्यंत प्रसन्न हैं। उन्होंने बताया कि आशीष और प्रीति की खुद भी दिल से यही इच्छा थी कि उनकी पहली संतान बेटी हो। वाहन सजाने से लेकर स्वागत की सारी तैयारियां परिवार ने मिलकर खुद कीं। अंकित ने यह भी बताया कि काफी अर्से से घर में बेटी की कमी महसूस की जा रही थी और अब इस नन्ही परी के आने से वह अधूरापन पूरा हो गया है। परिवार ने तय किया है कि बच्ची का नामकरण संस्कार भी धूमधाम से उत्सव के रूप में मनाया जाएगा। आशीष के माता-पिता सुंदर लाल और शकुंतला देवी की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं है।
यह घटना इसलिए भी समाज में चर्चा का विषय बन गई है क्योंकि पहाड़ के दूरदराज के गांवों में आज भी बेटी के जन्म को लेकर वैसा उत्साह नहीं दिखता जैसा बेटे के जन्म पर होता है। ऐसे में मलेथा के इस परिवार ने जो किया, वह केवल एक पारिवारिक खुशी का इजहार नहीं, बल्कि पूरे समाज को दिया गया एक सशक्त संदेश है कि बेटियां बोझ नहीं, बल्कि घर की रौनक और समाज की शान होती हैं।

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