
देहरादून। विश्व रक्तदाता दिवस पर वीरा फाउंडेशन ने शिमला बाईपास स्थित कार्यालय में रक्तदान जागरूकता संगोष्ठी व सम्मान समारोह आयोजित किया। मुख्य वक्ता यूथ रेडक्रॉस सोसाइटी के रक्तदाता शिरोमणि डॉ. अनिल वर्मा ने रक्त संचरण के जनक डॉ. कार्ल लैंडस्टीनर को श्रद्धांजलि दी।
डॉ. वर्मा ने बताया कि 1900-1901 में लैंडस्टीनर ने ABO ब्लड ग्रुप की खोज कर चिकित्सा जगत में क्रांति की। 1940 में आरएच फैक्टर की खोज से गर्भावस्था और रक्ताधान की जटिलताएं दूर हुईं। इस उपलब्धि के लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला।
डॉ. अनिल वर्मा ने कहा कि आज करोड़ों लोग रक्त औषधि से जिंदा हैं। उन्होंने खुद 155 से अधिक बार रक्तदान किया है और 100 से ज्यादा शिविरों के जरिए 10 हजार से अधिक रक्तदान कराए। एक लाख से ज्यादा युवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रेरित किया। 55 वर्षों से स्कूल-कॉलेजों में एनसीसी, एनएसएस, स्काउट-गाइड, रेडक्रॉस के जरिए एनीमिया, थैलेसीमिया व रक्तदान जागरूकता अभियान चला रहे हैं।
डॉ. वर्मा और उनकी पत्नी ने दधीचि देहदान समिति में नेत्रदान, अंगदान व सम्पूर्ण देहदान का संकल्प लिया है। मृत्यु के बाद नेत्रदान महंत इन्द्रेश हॉस्पिटल और देहदान दून मेडिकल कॉलेज को होगा। उनके जीवन का उद्देश्य है- ‘कोई भी मरीज रक्त के अभाव में न मरे और कोई स्वस्थ व्यक्ति रक्तदान किए बिना न मरे।’
155 बार रक्तदान और देहदान संकल्प के लिए वीरा फाउंडेशन ने डॉ. अनिल वर्मा को ‘डॉ. कार्ल लैंडस्टीनर रक्तदान क्रांतिवीर अवार्ड’ से सम्मानित किया।
सीईओ रितु डोभाल ने कहा, ‘रक्तदाता देवदूत से कम नहीं। रक्त का कोई विकल्प नहीं है।’ सीओओ विनोद डोभाल ने बताया कि संस्था अब तक 35 शिविर लगा चुकी है। सह-संस्थापक यशवीर सिंह राणा ने रक्तदान को महापुण्य बताया।

Recent Comments