ॐ नमो भगवते बहुचरायै।
भारतीय धार्मिक परंपरा में अनेक देवी-देवता ऐसे हैं जो विभिन्न समुदायों की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। इन्हीं में से एक है बहुचरा माता (Bahuchara Mata), जिन्हें मुर्गे वाली माता या कुक्कुट वाहिनी भी कहा जाता है। गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित बेचराजी (Becharaji) का यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ किन्नर (हिजड़ा/ट्रांसजेंडर) समाज की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। यहां माता मुर्गे पर सवार होकर विराजमान हैं और भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं, खासकर संतान प्राप्ति और सुरक्षा की।
पौराणिक कथा: बहुचरा माता की उत्पत्ति और चमत्कार
पौराणिक कथाओं के अनुसार, बहुचरा माता दुर्गा या पार्वती का एक रूप हैं। एक प्राचीन कथा यह है कि प्राचीन काल में गुजरात क्षेत्र में एक घने जंगल में एक तालाब था, जो लिंग परिवर्तन की शक्ति रखता था। कोई भी स्त्री उस तालाब में स्नान करने से पुरुष बन जाती थी, घोड़ी घोड़ा बन जाती थी। इसी क्षेत्र में बहुचरा देवी का अवतरण हुआ।
एक प्रमुख लोक कथा के अनुसार, एक बार मुस्लिम आक्रमणकारी (कुछ कथाओं में अलाउद्दीन खिलजी या अन्य सुल्तान के सैनिक) ने बहुचरा माता के क्षेत्र पर आक्रमण किया। माता ने अपनी शक्ति से सैनिकों के पेट फाड़ दिए और उनके अंदर से मुर्गे निकल आए। इससे आक्रमणकारी भयभीत होकर भाग खड़े हुए। इसी चमत्कार के कारण माता का वाहन मुर्गा (कुक्कुट) बन गया, जो सतर्कता, जागरण और नकारात्मक शक्तियों के विनाश का प्रतीक है।
किन्नर समाज में यह मान्यता है कि बहुचरा माता अर्धनारीश्वर (शिव-पार्वती के संयुक्त रूप) का प्रतीक हैं। वे किन्नर समुदाय की रक्षक और मार्गदर्शक हैं। किन्नर अखाड़े की कुलदेवी के रूप में उनकी पूजा हर शुभ कार्य की शुरुआत में की जाती है। माता की कृपा से निःसंतान दंपत्तियों को पुत्र प्राप्ति होती है और किन्नर भक्तों को सम्मान व सुरक्षा मिलती है।
मंदिर का महत्व और विशेषताएं
- स्थान: गुजरात के मेहसाणा जिले में बेचराजी कस्बा। मंदिर का निर्माण वडोदरा के गायकवाड़ राजाओं ने करवाया था।
- स्वरूप: माता चार भुजाओं वाली हैं – एक हाथ में तलवार (रक्षा के लिए), एक में त्रिशूल, एक में अभय मुद्रा और एक में ज्ञान का प्रतीक। वे मुर्गे पर सवार दिखाई जाती हैं।
- विशेष: मंदिर परिसर में मुर्गे स्वतंत्र रूप से घूमते रहते हैं। इन्हें मारना या खाना वर्जित है। किन्नर समुदाय यहां विशेष पूजा-अनुष्ठान करते हैं और चांदी का मुर्गा चढ़ाते हैं।
- आस्था: नवरात्रि में यहां भारी भीड़ होती है। देशभर से किन्नर और अन्य भक्त आते हैं। मन्नत पूरी होने पर कई भक्त मुर्गे का बलिदान या चढ़ावा चढ़ाते हैं (परंपरा के अनुसार)।
यह धाम न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक समावेश का भी प्रतीक है। यहां किन्नर समाज को पूर्ण सम्मान मिलता है और वे माता के आशीर्वाद से अपनी पहचान को गौरवपूर्ण मानते हैं।
प्रेरणा और संदेश
बहुचरा माता हमें सिखाती हैं कि भक्ति और शुद्ध हृदय से हर बाधा पार की जा सकती है। मुर्गा जागरण का प्रतीक है – अंधकार को दूर करके प्रकाश लाना। आज के युग में यह कथा हमें सिखाती है कि समाज के हर वर्ग की आस्था का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि दिव्य शक्ति सबके लिए समान रूप से करुणामयी है।
जो भी भक्त सच्चे मन से बहुचरा माता के दरबार में पहुंचता है, माता उसकी रक्षा करती हैं और मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
जय बहुचरा माता! जय मुर्गे वाली माता!
किन्नर समाज की कुलदेवी की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे।
अस्वीकरण (Disclaimer)
इस लेख/सामग्री में दी गई सूचना, तथ्य और विचारों की सटीकता, संपूर्णता, या उपयोगिता के लिए [merouttrakhand.in] किसी भी प्रकार से उत्तरदायी या जिम्मेदार नहीं है। यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है और इसे किसी भी पेशेवर सलाह (जैसे धार्मिक, कानूनी, वित्तीय, चिकित्सा, आदि) का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। पाठक इन जानकारियों के आधार पर कोई भी कदम उठाने से पहले अपने विवेक का उपयोग करें या किसी विशेषज्ञ से सलाह लें।

Recent Comments