चारधाम यात्रा में आया ठहराव: श्रद्धालुओं की भीड़ में 63 हजार की गिरावट

केदारनाथ धाम ने तोड़े रिकॉर्ड, अन्य धामों में दिखा नकारात्मक रुझान

आस्था और हिमालयी संवेदनशीलता के बीच डोलती चारधाम यात्रा: एक विश्लेषण

देहरादून। उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा इन दिनों एक अनोखे पड़ाव पर है, जहाँ आस्था के सैलाब के बीच श्रद्धालुओं की संख्या में पिछले वर्ष की तुलना में कुछ कमी दर्ज की गई है। देहरादून स्थित एसडीसी फाउंडेशन की ताजा विश्लेषण रिपोर्ट एक चौंकाने वाला खुलासा करती है कि वर्ष 2026 की यात्रा के पहले महीने में, पिछले साल की तुलना में भक्तों की संख्या में लगभग 3.7 प्रतिशत की गिरावट आई है। आंकड़ों के आईने में देखें तो 19 अप्रैल से 18 मई के बीच जहाँ पिछले वर्ष 17 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे थे, वहीं इस बार यह संख्या 16 लाख 43 हजार के आसपास सिमट गई है। यानी इस बार करीब 63,829 कम यात्रियों ने देवभूमि की चौखट पर दस्तक दी है।

हालांकि, यात्रा की इस धीमी रफ्तार के बीच केदारनाथ धाम का आकर्षण आज भी सिर चढ़कर बोल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, कुल श्रद्धालुओं का 40 प्रतिशत हिस्सा अकेले केदारनाथ में उमड़ा है, जो पिछले साल के मुकाबले और भी बढ़ गया है। केदारनाथ में जहाँ भीड़ बढ़ रही है, वहीं बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे धामों में श्रद्धालुओं की संख्या में हल्की कमी देखी गई है। फिलहाल हर दिन लगभग 55 हजार भक्त हिमालय की इन कंदराओं में पहुंच रहे हैं। यदि मौसम का मिजाज नरम रहा और व्यवस्थाएं चाक-चौबंद रहीं, तो उम्मीद जताई जा रही है कि जून के अंत तक यह आंकड़ा 40 लाख को पार कर सकता है।

लेकिन भक्ति के इस सफर में सुरक्षा और सेहत की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र की रिपोर्ट इस यात्रा के स्याह पक्ष को उजागर करती है, जिसके अनुसार अब तक 55 श्रद्धालु अपनी जान गंवा चुके हैं, जिनमें से सर्वाधिक 30 मौतें अकेले केदारनाथ धाम में हुई हैं। इस गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल का कहना है कि हमें चारधाम यात्रा को केवल धर्म और आस्था के चश्मे से ही देखना चाहिए, बल्कि यह हिमालयी क्षेत्रों की नाजुक पारिस्थितिकी से जुड़ा एक गंभीर विषय भी है।

नौटियाल इस बात पर जोर देते हैं कि उत्तराखंड में पर्यटन के नए रिकॉर्ड बनाने की अंधी दौड़ के बजाय हमें ‘कैरींग कैपेसिटी’ (धारण क्षमता), यातायात प्रबंधन और आपदा सुरक्षा जैसे ठोस पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करना होगा। अंततः, चारधाम यात्रा का भविष्य तभी सुरक्षित और सुखद होगा जब हम इसे केवल संख्याबल का खेल न मानकर एक सतत, संतुलित और व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करेंगे।

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