लालच की दौड़ में खाली हाथ

जीवन भर कुछ न कुछ लालच लगा ही रहता है कि कुछ मिलेगा, कुछ मिलेगा। कई बार आध्यात्मिक क्षेत्र में आकर भी लोग वही लालच करते रहते हैं। लोग यही सोचते रहते हैं कि यहां नहीं तो दूसरी जगह, कहीं न कहीं कुछ तो मिल ही जाए। ऐसे व्यक्ति को सुख कैसे मिलेगा? न ही लोभी को और न ही कामी को सुख मिलता है। सुख उसे ही मिलता है, जो निसंग है। संग से मिलने वाला सुख दो कौड़ी का है। निसंग होकर जो सुख की उपज भीतर से आती है, वही वास्तविक सुख है। संग का सुख मोमबत्ती की रोशनी की तरह है। उसमें सुख तो है पर भीतर के प्रकाश का पता नहीं चलता।
प्राण जला, तन जला, मन जला, बुद्धि भ्रमित हो गई और व्यक्ति की मृत्यु हो गई। फिर व्यक्ति उसी सुख की तलाश में जन्म लेकर फिर वहीं गोता लगाता रहता है। जब गुरु मिलते हैं तो कहते हैं- आप निरंजन हैं, आप प्रकाशमय हैं। यह कहने पर मन ठहरा, कुछ क्षण शांत हुए। फिर लगता है कि मैं जिसकी तलाश में जगह-जगह घूमता फिरता रहा, वो तो यहीं पर, इसी क्षण है।

अब ताली बजा कर जोर-जोर से गाते हैं, भजन गाकर थक जाते हैं, तो दो मिनट के लिए अच्छा ध्यान लगता है। इस तरह से गाना भी एक क्रिया हुई। और जब हम पहाड़ चढ़-चढ़ के वैष्णो देवी जाते हैं तो रजोगुण, तमोगुण दोनों समाप्त हो जाता है। हम थक जाते हैं, फिर वहां जाकर बैठते हैं तो अच्छा ध्यान लगने लगता है।

हमारे पूर्वजों ने पहाड़ों में देवी-देवताओं को इसीलिए बैठाया है। उसका भी कारण यही है। जब कोई कहता है कि आप क्रिया कीजिए, ध्यान कीजिए, प्राणायाम कीजिए, तो मन नहीं लगता। अब वहां पहाड़ में, तीन पहाड़ चढ़िए और उतरिए। इतना करके तो मन शांत हो ही जाता है। अब इतना पहाड़ चढ़ते हैं तो अपनी सांस भी चढ़ती है। और प्राणायाम हो ही जाता है, कई बार चढ़ते-चढ़ते सांस की गति ऊपर नीचे होते-होते सुदर्शन क्रिया हो जाती है। तो जो अनुभव आपको इतना पहाड़ चढ़ के हुआ, वही अनुभव प्राणायाम, ध्यान और सुदर्शन क्रिया करके, बैठे-बैठे, वहीं हो गया।

बस टांगों में दर्द नहीं हुआ। शरीर में, सिर में जो दर्द था, वो भी मिट गया। इस तरह से जब कुछ करने के राग से छुटकारा मिल जाए, तभी हम निष्क्रिय हो सकते हैं। आप कितना स्वाद ले सकते हैं, कितना भोजन कर सकते हैं, कितना देख सकते हैं, कितना सूंघ सकते हैं, कितना सुन सकते हैं? प्रवचन भी कुछ ही देर सुनने से अच्छा लगता है। संगीत या सत्संग कितनी देर तक सुन सकते हैं? साल में एक-दो बार जगराता होता है, लोग रात भर बैठ के सुनते हैं।

लेकिन यदि वही महीने भर प्रतिदिन करके देखें, क्या होगा? इन सब को भोगने की शक्ति सीमित है। मगर मन के लालच की कोई सीमा नहीं है। लालच ही तो हमको अपने आप से मिलने नहीं देता। देने में जो आनंद मिलता है, वही वास्तविक है। लेने का आनंद बचकाना है, देने का आनंद रईसों का है।

लेखक श्री श्री रविशंकर  : (श्री श्री रविशंकर को मानवातावदी और आध्यात्मिक गुरु के तौर पर वैश्विक स्तर पर पहचाना जाता है। मानव मूल्यों को बढ़ाकर, हिंसा और तनाव मुक्त समाज स्थापित करने से संबंधित इनके दृष्टिकोण ने सैकड़ों लोगों को अपने उत्तरदायित्वों को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है। निश्चित रूप से यह विश्व की बेहतरी के लिए एक बड़ा कदम साबित हुआ।)

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