2014 में बेटी की शादी के लिए लिया था सवा लाख का ऋण, पति और बड़ी बेटी की मौत के बाद टूटा परिवार; डीएम ने बैंक ऋण का कराया वन टाइम सेटलमेंट, 33 हजार रुपये भी जमा कराकर दिलाई एनओसी-नो ड्यूज, फैजा की फीस ‘नंदा-सुनंदा’ से भरी और नातिन आयरा का आरटीई में कराया दाखिला
देहरादून । प्रशासनिक संवेदनशीलता और मानवीय हस्तक्षेप का एक मार्मिक उदाहरण देहरादून में सामने आया है, जहां जिलाधिकारी सविन बंसल ने विपरीत परिस्थितियों से जूझ रही असहाय विधवा क्षमा परवीन को न केवल वर्षों पुराने बैंक ऋण के बोझ से मुक्त कराया, बल्कि उनकी बेटियों और नातिन के भविष्य को भी सहारा दिया। जिला प्रशासन के प्रयासों से डीसीबी बैंक से लिया गया पुराना ऋण वन टाइम सेटलमेंट के माध्यम से समाप्त कराया गया, बैंक से नो ड्यूज और एनओसी जारी कराई गई, और सेटलमेंट के बाद बची 33 हजार रुपये की शेष धनराशि भी जमा कराई गई।
क्षमा परवीन ने 28 मार्च 2026 को जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचकर अपनी पीड़ा सुनाई थी। उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 में बड़ी बेटी के विवाह के लिए डीसीबी बैंक से सवा लाख रुपये का ऋण लिया था। लेकिन उसी वर्ष पति की मृत्यु हो जाने से परिवार आर्थिक संकट में डूब गया। जैसे-तैसे परिवार संभल ही रहा था कि वर्ष 2020 में कोविड काल के दौरान उनकी बड़ी विवाहित बेटी का भी निधन हो गया। एक के बाद एक लगे इन गहरे पारिवारिक आघातों, खराब स्वास्थ्य और लगातार बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच क्षमा परवीन शेष ऋण नहीं चुका सकीं।
आज स्थिति यह थी कि एक बेटी को खो चुकी यह विधवा मां अपनी तीन अविवाहित बेटियों, एक पुत्र और पांच वर्षीय नातिन के भरण-पोषण और शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी अकेले उठा रही थी। घर की आर्थिक हालत इतनी कमजोर थी कि न केवल बैंक ऋण बोझ बना हुआ था, बल्कि बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होने लगी थी। ऐसे में जिला प्रशासन देहरादून की टीम उनके लिए वास्तविक सहारा बनकर सामने आई।
मामले की जानकारी मिलते ही जिलाधिकारी सविन बंसल ने त्वरित संज्ञान लिया और संबंधित बैंक से समन्वय स्थापित कर ऋण को वन टाइम सेटलमेंट के तहत निस्तारित कराया। प्रशासनिक स्तर पर पहल करते हुए बैंक से क्षमा परवीन को विधिवत नो ड्यूज प्रमाण पत्र और एनओसी जारी कराई गई। इतना ही नहीं, समझौते के बाद बची 33 हजार रुपये की राशि भी जमा कराकर वर्षों से सिर पर लटका कर्ज का संकट समाप्त कर दिया गया। इस कदम से एक असहाय परिवार को बड़ी मानसिक, सामाजिक और आर्थिक राहत मिली।

जिलाधिकारी ने सहायता को केवल ऋण निपटान तक सीमित नहीं रखा। परिवार की शैक्षिक जरूरतों को भी गंभीरता से लेते हुए क्षमा परवीन की छोटी बेटी फैजा की पढ़ाई फिर से शुरू कराई गई। आर्थिक तंगी के चलते बाधित हो रही उसकी शिक्षा को “नंदा-सुनंदा” परियोजना के माध्यम से पुनर्जीवित किया गया और 27 हजार रुपये की स्कूल फीस परियोजना से जमा कराई गई। प्रशासन ने यह भी सुनिश्चित किया कि परिवार को कागजी अड़चनों में न उलझना पड़े, इसलिए मौके पर ही आय प्रमाण पत्र जारी करवाकर आगे की प्रक्रिया आसान बनाई गई।
इसी क्रम में पांच वर्षीय नातिन आयरा के भविष्य को भी सुरक्षित करने की दिशा में तत्परता दिखाई गई। आरटीई के तहत उसके नजदीकी निजी विद्यालय में दाखिले की व्यवस्था कराई गई। प्रवेश में आय प्रमाण पत्र की बाधा सामने आने पर जिलाधिकारी के निर्देश पर उसे तत्काल दूर कराया गया और आयरा का दाखिला सुनिश्चित किया गया। इस कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिला प्रशासन की भूमिका केवल समस्या सुनने तक सीमित नहीं, बल्कि समाधान तक पहुंचाने वाली सक्रिय व्यवस्था की है।
क्षमा परवीन का यह प्रकरण बताता है कि जब प्रशासन संवेदनशीलता के साथ कार्य करता है, तो वह केवल फाइलें नहीं निपटाता, बल्कि टूटते परिवारों को संबल भी देता है। पति की मृत्यु, बेटी को खोने का दर्द, कर्ज का बोझ, बेटियों की पढ़ाई की चिंता और नातिन के भविष्य का सवाल—इन सबके बीच घिरी एक असहाय महिला के लिए देहरादून जिला प्रशासन उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है।
जिला प्रशासन ने संकेत दिया है कि जरूरतमंद, असहाय और संकटग्रस्त नागरिकों की सहायता के लिए वह पूरी तरह प्रतिबद्ध है और ऐसे मामलों में प्राथमिकता के आधार पर राहत पहुंचाई जाएगी। क्षमा परवीन को मिली यह मदद सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन का जीवंत उदाहरण बन गई है।

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