नई दिल्ली/देहरादून: उत्तराखंड के दो आईजी स्तर के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति का मामला अब कानूनी पेचीदगियों में फंस गया है। जहाँ एक ओर सरकार ने प्रक्रिया पूरी कर आदेश जारी कराए, वहीं अधिकारियों ने इसे संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत बताते हुए चुनौती दी है। कैट (CAT) के ताजा आदेश ने फिलहाल उन्हें बड़ी राहत दी है, जिससे उनकी वर्तमान तैनाती यथावत बनी रहेगी।”
उत्तराखंड कैडर के दो वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारियों नीरू गर्ग (2005 बैच) और अरुण मोहन जोशी (2006 बैच) को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) से महत्वपूर्ण राहत मिली है। अधिकरण ने केंद्र सरकार द्वारा उनकी प्रतिनियुक्ति (deputation) से संबंधित आदेशों पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
इस फैसले से दोनों आईजी रैंक के अधिकारियों को फिलहाल केंद्र की केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में एक रैंक नीचे यानी डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (DIG) पद पर तैनाती से राहत मिल गई है। वे अपनी मौजूदा आईजी रैंक पर उत्तराखंड पुलिस में ही सेवा जारी रख सकेंगे, जब तक मामला आगे नहीं बढ़ता।
नीरू गर्ग वर्तमान में उत्तराखंड में इंस्पेक्टर जनरल (फायर सर्विसेज) के पद पर कार्यरत हैं, जबकि अरुण मोहन जोशी इंस्पेक्टर जनरल (CID) का प्रभार संभाल रहे हैं। केंद्र सरकार ने हाल ही में गृह मंत्रालय के आदेश से नीरू गर्ग को इंडो-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) में DIG के पद पर और अरुण मोहन जोशी को सीमा सुरक्षा बल (BSF) में DIG के पद पर प्रतिनियुक्ति पर भेजने के आदेश जारी किए थे।
दोनों अधिकारियों ने इन आदेशों को चुनौती देते हुए दावा किया कि यह प्रतिनियुक्ति उनकी सहमति के बिना की गई है और उनकी मौजूदा आईजी रैंक से नीचे है, जो सेवा नियमों का उल्लंघन है। उन्होंने इसे “मालाफाइड” (दुराग्रही) और सत्ता के दुरुपयोग बताया।
मार्च 2026 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें सीधे हाईकोर्ट आने के बजाय पहले CAT में अपील करने का निर्देश दिया था। उसके बाद दोनों अधिकारियों ने CAT का रुख किया, जहां अब अंतरिम राहत मिली है।
अधिकारियों का तर्क है कि प्रतिनियुक्ति के लिए empanelment (पैनल में नाम शामिल करना) की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी और राज्य सरकार ने बिना उनकी सहमति के नाम केंद्र को भेज दिए। उन्होंने कहा कि IG रैंक वाले अधिकारियों को DIG पद पर भेजना उनके करियर और पदोन्नति को प्रभावित कर सकता है।
CAT के इस अंतरिम आदेश से दोनों अधिकारियों को तत्काल राहत मिली है। अगली सुनवाई में मामले का अंतिम फैसला होगा, जो अन्य समान मामलों के लिए भी मिसाल बन सकता है।
यह घटनाक्रम आईपीएस अधिकारियों की केंद्र प्रतिनियुक्ति, रैंक संरक्षण और सहमति संबंधी मुद्दों पर चर्चा को फिर से तेज कर गया है। उत्तराखंड पुलिस और प्रशासनिक गलियारों में इस फैसले का स्वागत किया जा रहा है, जबकि केंद्र सरकार की ओर से अभी तक आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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