

देहरादून,। क्रॉनिक किडनी डिजीज से जूझ रहे मरीजों को जानकारी और मनोबल देने के लिए मणिपाल हॉस्पिटल ने मंगलवार को ‘डायलिस पेशेंट समिट’ का आयोजन किया। मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ नेफ्रोलॉजी एंड यूरोलॉजी की इस विशेष पहल में 50 से अधिक डायलिसिस मरीज, प्रत्यारोपण प्राप्त कर चुके लोग, डायलिस की प्रतीक्षा कर रहे मरीज और उनके देखभालकर्ता शामिल हुए।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अर्घ्य मजूमदार, एडवाइजर एवं वरिष्ठ सलाहकार, नेफ्रोलॉजी और डॉ. उपल सेनगुप्ता, निदेशक एवं क्लिनिकल लीड, नेफ्रोलॉजी ने किया। यूरोलॉजिस्ट डॉ. बस्तब घोष भी उपस्थित रहे। दीप प्रज्ज्वलन के बाद पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने किडनी रोग से जुड़ी भ्रांतियां दूर कीं और समय पर निदान, डायलिसिस व प्रत्यारोपण में हुई नई प्रगति पर बात की। डॉक्टरों ने संतुलित आहार, जीवनशैली में बदलाव और नियमित उपचार को सीकेडी प्रबंधन की कुंजी बताया।
मरीजों को व्यक्तिगत परामर्श के लिए डायटेटिक्स, फिजियोथेरेपी, मनोविज्ञान, डायलिसिस और पेरिटोनियल डायलिसिस की टीमों ने विशेष कियोस्क लगाए। यहां मरीजों ने सीधे विशेषज्ञों से सवाल पूछे। कार्यक्रम को प्रेरणादायक बनाने के लिए निबंध प्रतियोगिता भी हुई। शांतनु चटर्जी, सुसांत गांगुली, पारस शर्मा, प्रोजेश कुमार घोष, मलोया तलापात्रा, सार्थक दास और डॉ. काबेरी चौधुरी को उनके साहस के लिए सम्मानित किया गया।
डॉ. मजूमदार ने कहा कि एंड-स्टेज रीनल डिजीज मरीज और परिवार दोनों को प्रभावित करती है। डायलिस सिर्फ प्रक्रिया नहीं, जीवन बदलने वाला सफर है। डॉ. सेनगुप्ता ने बताया कि भारत में हर साल 2 लाख से ज्यादा लोग एंड-स्टेज किडनी डिजीज से प्रभावित होते हैं। प्रत्यारोपण डायलिसिस की तुलना में बेहतर जीवन देता है, पर जागरूकता की कमी से लोग देर कर देते हैं।
प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ता अरूप कुमार दास ने बताया कि 2007 में किडनी फेल होने के बाद 2008 में ट्रांसप्लांट हुआ और पिछले 18 साल से वे सक्रिय जीवन जी रहे हैं। अधिवक्ता प्रद्युम्न सिन्हा ने कहा कि सही मार्गदर्शन से डर दूर हुआ और सामान्य जीवन संभव हुआ।
हॉस्पिटल डायरेक्टर दिलीप कुमार रॉय ने कहा कि मणिपाल की कोशिश सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि मरीजों को हर कदम पर सहयोग देना है। समिट के अंत में मरीजों और विशेषज्ञों के बीच सीधा संवाद हुआ।

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