नमामि गंगे मिशन को मिली नई गति, अलकनंदा में छोड़ी गईं 7 हजार महाशीर मछलियां

श्रीनगर/टिहरी गढ़वाल। नमामि गंगे परियोजना के तहत अलकनंदा नदी की जैव-विविधता के संरक्षण और नदीय पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए 7,000 महाशीर मछली की उंगलिकाओं (फिंगरलिंग्स) को धारी देवी के निकट बांध क्षेत्र से ऊपर अलकनंदा नदी में प्रवाहित किया गया। यह कार्यक्रम केंद्रीय अंतःस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CIFRI), बैरकपुर (कोलकाता), हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग तथा मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में जंतु विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मंजू प्रकाश गुसाईं, डीएसडब्ल्यू प्रो. ओ.पी. गुसाईं, यूनिवर्सिटी फिश हैचरी के समन्वयक प्रो. दीपक सिंह तथा मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल से पुष्कर सिंह नयाल एवं संजय सिंह विशेष रूप से उपस्थित रहे। सभी विशेषज्ञों ने नदी संरक्षण, जलीय जीवों के संवर्धन तथा जैव-विविधता के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

इस अवसर पर प्रो. दीपक सिंह ने कहा कि महाशीर उत्तराखंड की राजकीय मछली है और हिमालयी नदियों की पारिस्थितिकी में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। हालांकि विभिन्न कारणों से प्रदेश की नदियों में इसकी संख्या लगातार घट रही है। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा भी महाशीर को संकटग्रस्त प्रजातियों में शामिल किया गया है, इसलिए इसका संरक्षण और संवर्धन समय की आवश्यकता है।

उन्होंने बताया कि जन्तु विज्ञान विभाग, चौरास परिसर, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय में अलकनंदा हाइड्रोपावर कंपनी के सहयोग से महाशीर प्रजाति के संरक्षण हेतु एक विशेष फिश हैचरी स्थापित की गई है। इसके अलावा टिहरी गढ़वाल स्थित मत्स्य विभाग की हैचरी में भी इस प्रजाति का संवर्धन किया जा रहा है। इन्हीं दोनों हैचरियों में विकसित 7,000 महाशीर मछलियों की उंगलिकाओं को अलकनंदा नदी में छोड़ा गया।

जानकारी दी गई कि दोनों हैचरियों को नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय अंतःस्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर द्वारा आंशिक वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।

कार्यक्रम में नमामि गंगे परियोजना से जुड़े प्रोजेक्ट वैज्ञानिक डॉ. उपेंद्र सिंह, डॉ. जितेंद्र सिंह राणा एवं डॉ. रणजीत सिंह ने महाशीर के संरक्षण और उसकी उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि नमामि गंगे अभियान के तहत अब तक गंगा नदी के विभिन्न हिस्सों में लगभग 40 हजार महाशीर मछलियों के बच्चों को छोड़ा जा चुका है, जिससे नदी की जैव-विविधता को पुनर्जीवित करने में मदद मिल रही है।

इस अवसर पर शोधार्थियों सचिन, राहुल, अजय, आयुष, राकेश सहित बड़ी संख्या में स्थानीय मत्स्य पालकों ने भी भाग लिया। सभी प्रतिभागियों ने गंगा और उसकी सहायक नदियों को स्वच्छ, निर्मल और जीवंत बनाए रखने का संकल्प लिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि महाशीर जैसी दुर्लभ और महत्वपूर्ण प्रजातियों का संरक्षण न केवल नदी की पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखने में सहायक होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालयी नदियों की जैविक समृद्धि को भी सुरक्षित रखेगा।

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