स्पिक मैके ने देहरादून में आयोजित किया सितार वादक पं. गौरव मजूमदार का विशेष कार्यक्रम

देहरादून : स्पिक मैके उत्तराखंड के तत्वावधान और एसआरएफ़ फ़ाउंडेशन के सहयोग से प्रख्यात सितार वादक पं. गौरव मजूमदार ने आज वेल्हम गर्ल्स’ स्कूल और पुरकुल यूथ डेवलपमेंट सोसाइटी (पीवाईडीएस) में अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से विद्यार्थियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वेल्हम गर्ल्स’ स्कूल में उन्होंने भावपूर्ण राग चरुकेशी प्रस्तुत किया, जिसे विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सराहा। उनके साथ तबले पर ज़हीन ख़ान ने संगत की।

अपने गुरु भारत रत्न पं. रवि शंकर की परंपरा में रचे-बसे पं. मजूमदार ने विद्यार्थियों को बताया कि भले ही कोई वाद्य में निपुण हो, किंतु स्वरलिपि और गायन का अभ्यास अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा, “वोकल संगीत हर सीख की बुनियाद है। यदि आप गा नहीं सकते या स्वरों को मुखर रूप से व्यक्त नहीं कर सकते, तो एक संगीतज्ञ के रूप में आपकी साधना अधूरी है।” उन्होंने यह भी समझाया कि किस प्रकार पं. रवि शंकर ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को बैठक के निजी दायरे से निकालकर वैश्विक मंचों तक पहुँचाया।

इसी कार्यक्रम श्रृंखला के तहत पं. मजूमदार ने देहरादून के कई अन्य संस्थानों में भी प्रस्तुति दी। डीएवी पब्लिक स्कूल में उन्होंने प्रातःकालीन राग नट भैरव, जो पं. रवि शंकर द्वारा निर्मित है, प्रस्तुत किया। केंद्रीय वन सेवा राज्य अकादमी (सीएएसएफओएस) में उन्होंने राग यमन की गहराई और प्रवाह को उकेरा। बी.एस. नेगी महिला प्रविधिक प्रशिक्षण संस्थान में उनका राग जौनपुरी का प्रस्तुतीकरण अत्यंत भावपूर्ण रहा। रामकृष्ण मिशन आश्रम में उन्होंने राग पटदीप प्रस्तुत किया।

पर्कल यूथ डेवलपमेंट सोसाइटी में पं. मजूमदार ने राग मधुवंती की कोमल भावनाओं और सुरों के सूक्ष्म विन्यास को समझाते हुए प्रस्तुति दी। उन्होंने प्रस्तुति का समापन भजन वैष्णव जन तो तेने कहिये से किया, जिसने उपस्थित श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया।

प्रत्येक मंच पर पं. मजूमदार ने रागों की संरचना, समय-सिद्धांत, भाव-रस, तथा स्वरों में सूक्ष्म परिवर्तन से राग का रूप कैसे परिवर्तित हो जाता है—इन सभी पहलुओं पर सरल और सहज व्याख्या दी।

ग्रैमी-नामांकित पं. मजूमदार का संगीत द्रुपद-बींकरी शैली और सेनिया परंपरा से जुड़ा हुआ है। इलाहाबाद के एक संगीत परिवार में जन्मे पं. मजूमदार ने कई विद्वान संगीतज्ञों से शिक्षा प्राप्त की और बाद में सात वर्षों तक पं. रवि शंकर के साथ रहकर गुरु-शिष्य परंपरा में संगीत साधना की। पिछले तीन दशकों में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय उत्सवों में प्रस्तुति दी है, विश्वभर के श्रेष्ठ कलाकारों के साथ सहयोग किया है, विभिन्न ऑर्केस्ट्रा व फिल्मों के लिए संगीत रचा है, तथा राग आकांक्षा जैसे नए रागों की रचना की है, जिसकी प्रस्तुति नए सहस्राब्दी के स्वागत में वैटिकन में की गई थी। उन्हें ग्रैमी नामांकन, भविष्य ज्योति पुरस्कार, उत्थान नटराज सम्मान, नाद योगी सम्मान और क्रिटिक्स’ चॉइस अवॉर्ड सहित कई सम्मान प्राप्त हैं I

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